जब हम छोटे थे
और हाथ आगे पीछे करते हुए
खाकी वर्दी पहनकर
अपने स्कूल के
शहीदों वाले स्मारक
‘इम्मोर्टल तिलैयन्स’
के बगल से मार्च करते हुए
निकलते थे
तब
वो अंग्रेजी की लाईनें रोज़ पढ़ा करते थे
“जब तुम घर जाओगे
तो कहना उनसे हमारे बारे में
कि उनके बेहतर कल के लिए
हमने अपना आज कुर्बान कर दिया”
अच्छा लगता था पढ़कर
और नसों में एक बवाल सा
उठता था
सीना गर्व से फूल जाता था
कि मैं उसी जगह हूँ
जहाँ से निकलकर
लोग ‘देश के लिए मर मिटे’
अब सोचता हूँ
कि मैं किसके लिए मरूँ?
साला, जब देश ही मर गया है!
