ये तो हम भलीभांति जानते हैं कि हिंदी फिल्मों में सेमुएल टेलर कॅलरिज का ‘विलिंग सस्पेंशन ऑफ़ डिसबिलीफ़’ हर जगह विद्यमान है। भले ही वो फिल्म यथार्थवादी ही क्यों न हो लेकिन उसमे आपको कई ऐसी चीजें मिल जाएँगी की आपको फ़िल्मी शब्दकोष में थोड़ा परिवर्तन करने को बाध्य कर देंगी।
और हाँ, कुछ चीजें आपको ऐसी मिलेंगी जो कि आपको ये विश्वास दिलाएंगी कि ‘शायद ये दृश्य उस फिल्म में भी था!’ लेकिन हैरान न हों, ऐसी बात नहीं है। वो दृश्य क्या, वैसे कई दृश्य हिंदी फिल्मों में लगातार इस्तेमाल किये जाते रहे हैं।
आइये एक नज़र डालते हैं हिंदी फ़िल्मों (बॉलीवुड) के उन दृश्यों पर जो कि हमें ऐसा प्रतीत कराते हैं कि ‘अरे! यही तो उस फिल्म में भी हुआ था!!!’
1. शहरी बाबू:
शहरी बाबू, जैसा की नाम से ही पता चलता है, आम तौर पर शहर से आया हुआ जवान लड़का हुआ करता था। वो शहर से गाँव क्यों आता था ये बात आज तक किसी को पता नहीं चली। शहरी बाबू इन्हें इसलिए भी कहते थे क्योंकि ये आम लोगों से अलग कपड़े पहनता था और गाँव वालो के हिसाब से अजीब हरकतें करता था।
इसके पास उस ज़माने की लेटेस्ट चीजें होती थी जो हिरोइन, या गाँव की गोरी, को उसकी तरफ आकर्षित करती थी। बकौल रेडिओ, टाॅर्च इत्यादि।
काम की बात: ये शहरी बाबू उस गाँव की गोरी के साथ इश्क करता था और एक समय के बाद उसे गर्भवती (प्रेग्नेंट) बनाकर हमेशा ही किसी निजी कारण से अचानक गायब हो जाता था। गोरी का भाई उसके खून का प्यासा हो जाता था और पूरा गाँव, जिसमे अब तक मर्दों का आभाव दिखता था, उसके आने का इंतज़ार करते थे।
बाद में हमेशा की तरह शहरी बाबू अपनी दुःख भरी कहानी लेकर वापस लौटता था और रास्ते में ही लड़की का भाई उसकी पिटाई कर देता था। लेकिन क्योंकि वह रिश्तेदार होता था, शहरी बाबू हीरो होने के बावजूद उसे कुछ नहीं करता था और काफी लड़ाई के बाद या गोरी के अचानक से प्रकट होकर रोकने के बाद लड़ाई रुकती थी। दोनों शादी करते थे और इस तरह फिल्म ख़तम होती थी।
2. कड़कती बिजली और जंगल:
लडकियों को गर्भवती बनाने का जितना श्रेय शहरी बाबू को जाता है उस से कहीं ज्यादा कड़कती हुई बिजली को। सामान्यतया, नायक और नायिका, चाहे वो शहरी हों या गाँव के, अकेले एक जंगल में पहुँच जाते थे। क्यों? इसका पता लगाया जा रहा है।
ऐसा हमेशा बरसात के मौसम में होता था। एक गाना गाने के बाद, कभी कभार गाने के दौरान ही, अचानक से जोर से बिजली गरती थी और डरपोक नायिका नायक के सीने से लिपट जाती थी। हीरो, ‘इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला’, ऐसा सोचते ही कुछ ऐसा कर गुजरता था, आमतौर पर किसी खंडहर या गुफा में, जिसके कारन नायिका गर्भवती हो जाती थी।
इस प्रकार के कुल गर्भधारण की संख्या भारत सरकार पता लगा रही है।
3. गरीब हीरो और अमीर ‘होने वाला ससुर’:
वैसे तो कई दार्शनिकों का मानना है कि गरीबी सबसे बड़ा अपराध है पर हिंदी फिल्मों के हीरो के लिते यह एक ‘एडेड एडवांटेज’ होता था। ये हीरो ज्यादातर गरीब होते थे और, अज्ञात कारणों से, हमेशा ही अमीर बाप की बेटियों से इश्क कर बैठते थे। ऐसे अमीर बाप के घर में एक बहुत बड़ा झूमर होता था और इधर उधर नंगी लड़कियों की मूर्तियाँ लगी होती थीं जो की वह इटली से मँगवाता था। और हाँ उसके घर में जगह जगह टेलीफोन लगे होते थे।
ख़ैर, जैसा की होनी को मंजूर होता था, आजतक किसी बाप ने, बिना किसी लड़ाई झगड़े के या बेटी को घर से निकाले, बेचारे इश्क के मारे हीरो की फ़रियाद नहीं सुनी। हीरो पहले उसके बाप को खुश करने की कोशिश करता था और असफल ही हुआ करता था।
हाँ, इन फिल्मो में नायिका की माँ (जिसके पास एक पोटली में जेवर हुआ करते थे) अपनी बेटी और होने वाले दामाद की भावना को समझती थी। यही माँ अपनी बेटी को भागने में मदद करती थी जिसकी शादी उसका बाप अपने दोस्त के बेटे से, जो की हमेशा ही गलत आदमी या गुंडा हुआ करता था, कराना चाहता था।
4. एक आँख वाला डाकू:
ये मुझे बचपन से आजतक समझ में नहीं आया की इन डाकुओं की एक आँख कैसे फूट जाती थी (सिवाय गब्बर के)। या शायद ऐसा होता हो कि जिनकी एक आँख फूट जाती थी वो डाकू बन जाते थे। पता नहीं!
हिंदी फिल्मों में डाकू, और कुछ हद तक खतरनाक गुंडे, हमेशा एक आँख वाले होते थे। आश्चर्य की बात ये है कि वह गैंग का सरदार होता था और दो आँखों वालों पर हुक्म चलाता था। पुलिस को आजतक ये भी पता नहीं चला है कि इनके पास दुनाली बन्दूक कहाँ से आती थी और गोलियों वाली बेल्ट में लाल लाल गोलियां रोज़ कौन डालता था। कुछ देशभक्त लोग इसमें पकिस्तान का हाथ बताते हैं।
5. हाथ का घायल होना और खून का लड़की के माथे पर गिरना:
कई फिल्मों में हीरो जब मंदिर में किसी काम से जाता था और वहाँ किसी काम से हिरोइन तब आ जाती थी जब गुंडा भी वहां अपने किसी काम से आ धमकता था। फिर एक जोरदार लड़ाई होती थी जिसमे कई नाज़ुक मौकों पर नायिका नायक की मदद करती हुई पाई जाती थी।
और जब हीरो जीत के करीब होता था, या कई बार जीत भी जाता था, तभी गुंडे द्वारा फेंका हुआ त्रिशूल उसकी हाथ में आ लगता था और खून सीधा लड़की की सूनी मांग में गिरता था। एक ‘आॅक्वार्ड मोमेंट’, हीरो हिरोइन को और भगवान् की मूर्ती को देखता था, हिरोइन भी देखती थी, भगवान् साक्षी होते थे और दोनों की अनजाने में शादी हो जाती थी। ऐसा पाया गया है की ये शादियाँ हमेशा अत्यधिक सफल हुआ करती थीं।
6. गाँव के लोग:
पहली बात, गाँव के लोगों को हमेशा मूर्ख दिखाया जाता रहा है। चाहे वह ‘भेड़िया आया’ वाला चरवाहा हो या ‘ये सुसाइड क्या होता है’ पूछने वाला अनभिज्ञ किसान, गाँव वालों को हमेशा मूर्ख ही दिखाया जाता रहा है।
उनकी बेटियों को कोई शहरी बाबू ही ले जाता है जैसे कि गाँव के सारे जवान मर गए हों! एक बात अच्छी यह है की गाँव के लोग हर फिल्म में साफ़ और एकदम सफ़ेद कपड़े पहनते थे। इनका एक यादगार डायलॉग होता था, “साहब, हम गाँव के लोग जरूर हैं पर कोई हमारी इज्जत से खेले ये हमें बिलकुल बर्दाश्त नहीं।”
7. परमसुन्दरी कुम्हारन:
ये बात तो पिछले साल आई दबंग फिल्म तक में दिखाई गयी है। वैसे मुझे इस से कोई दिक्कत नहीं है पर न जाने क्यों हिंदी फिल्मो में कारीगरों की बेटियाँ चाहे वह लुहारन हो, कुम्हारन हो या चाकू छुरी तेज़ करने वाली, ये सब लडकियाँ हमेशा ही काफी सुन्दर हुआ करती थी… और कई बार तो बेहद गोरी चाहे उसका बाप कितना ही भद्दा क्यों न हो।
8. सिद्धांत वाले डकैत:
डाकुओं से जुड़ी एक और बात जो सामान्य तौर पर कई फिल्मो में दिखती है, वह ये है कि जिन फिल्मों में डाकू का रोल कोई वैसा अभिनेता करता हो जो आम तौर पर अच्छे व्यक्ति का रोल करता था बाकी फिल्मों में, वो हमेशा ही एक वसूलों वाला डाकू होता था।
उसके कुछ फेवरेट वसूल थे- किसी की बहू बेटी को हाथ न लगाना, किसी लाचार और गरीब का घर न लूटना, गरीबों की सहायता करना… और सबसे जरूरी किसी गाँववाली गोरी से इश्क कर बैठना। उसके बाकी किसी उसूल का कोई ज्यादा फायदा नहीं होता था पर ऐसा देखा गया है की गोरी से इश्क करने से समाज का भला होता था और वह ‘एक नयी जिंदगी’ शुरू करता था।
9: बलात्कारी गुंडे जो सफल नहीं हो पाते थे:
ये गुंडे बहुत ही दोयम दर्जे के होते थे जो, उनके मालिक के अनुसार, किसी काम के नहीं होते थे। ये ऐसे निकम्मे होते थे की एक मजबूर, जवान और अकेली हिरोइन का बलात्कार नहीं कर पाते थे बावजूद इसके कि वो कम से कम 4-5 की संख्या में होते थे।
एक हीरो, भले ही वह राहुल रॉय ही क्यों न हो, भले ही उसे जिम की स्पेलिंग भी न आती हो, भले ही वो पूरी फिल्म एक भी बार खाता हुआ न दिखाया गया हो, भले ही वो खाली हाथ हो और वो चाकू के साथ।।। पर ये कमीने हमेशा अपने बॉस का नाम खराब करते थे। और इसकी सजा भुगतता था उनका बॉस जिसे हीरो फिल्म के अंत में जान से मार देता था।
10. गुंडे जिनकी आँख उनकी बेटी फिल्म के अंत में खोल देती थी:
ये गुंडे थोड़े इमोशनल किस्म के होते थे। ये शुरू से लेकर अंत से थोड़ी देर पहले तक बिना काम की उलूल-जुलूल हरकतें करते रहते थे- जैसे की हीरो को पिटवाना (ये जानते हुए कि वो हीरो है!), उसकी बहन का बलात्कार करवा देना, मिथुन, सन्नी देओल, सुनील शेट्टी और खतरनाक अक्षय कुमार तक से पंगा लेना, अपनी बेटी को हीरो वाले कॉलेज में जाने से रोकना भले ही वहाँ अमिताभ बच्चन ही क्यों ना पढ़ता हो, हीरो की माँ को किडनैप करना (जघन्य अपराध), हमेशा स्मोकिंग करते रहना, दारू, लड़कियाँ नचाना और बिना बात के हँसना…
लेकिन जब हीरो इनकी बैंड बजा देता था और उनकी बेटी भी उनसे नफरत करने लगती थी, अंग्रेजी में ‘आई हेट यू डैडी’ कहकर, और बहुत पिट चुकने के बाद जब इनके सारे कारिंदे पिटकर भाग चुके होते थे, तब और कोई चारा न देख कर वो अपनी बेटी से माफ़ी मांगते थे और ख़ुशी ख़ुशी अपनी बेटी का हाथ हीरो के हाथ में देकर खुद के हाथ में हथकरियाँ पहन कर जेल चले जाते थे।
इनका अंतिम डायलॉग होता था, “बेटी तुमने मेरी आँखे खोल दी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।” दोनों रोते थे और पुलिस अपना काम करने लगती थी।
