नए मास्टर की रीढ़

antique-model-spine-metal-1011बात बहुत पुरानी है। एक गुरुकुल हुआ करता था। कहते हैं कि वहां प्रोफेशनल पढाई होती थी। जैसा कि हर पढाई के संस्थान में होता है, वहां भी दो तरह के विद्यार्थी (अंग्रेजी में students) होते थे: एक जो क्लास करते थे और परीक्षाएं देते थे और दुसरे वो जो निठल्ले और निहायत ही निकाम्मे और आवारागर्द थे, जो क्लास नहीं करते थे, पर पता नहीं क्यों और कैसे परीक्षाएं दे देते थे।

ये बात न सिर्फ पहली टाइप के बच्चों को ही नहीं बल्कि अध्यापकों को भी खलती थी। एक दिन बैठक में ये तय हुआ कि निकम्मे और निठल्ले विद्यार्थियों को, चाहे जो भी हो, परीक्षा में बैठने नहीं दिया जायेगा। परीक्षाएं हुई और ऐसे लोग परीक्षा नहीं दे पाए।

टीचर लोग अपनी कालर उठा कर चलने लगे और निकम्मे बच्चों पर एक दो ‘लुक’ भी पास करने लगे। लेकिन ये निकम्मे पुराने पापी और गुरुकुल की व्यवस्था से पूर्णतः वाकिफ थे। ये भी वही पुरानी ’35 mm’ की जाहिलों वाली जलालत भरी स्माइल देकर निकल लेते थे मानो ये कह रहे हों, “हंस लो मास्टर साहेब, रीटेस्ट के क्वेश्चन्स आप ही बनाओगे, अपने इन्ही हाथों से जिस से ये नारियल पानी पी रहे हो और हमें पास भी करोगे! ही ही ही…”

इन्हीं टीचरों में एक नया नया टीचर आया था जिसे दुनियादारी वाली बातें उसका बाप भी नहीं समझा पाया था। उसका फंडा सिंपल था: निकम्मे चाहे सोनिया गाँधी की औलाद हों या फिर महात्मा गाँधी की, वो निकम्मे हैं और वो नाक रगड़ के मर जायें, बिना खुद को सही तरीके से प्रूव किये बगैर पास नहीं होंगे। निकम्मे लोग उसे हलके में लेते थे और सोचते थे, “अबे, नया नया आया है, लौंडा है अभी, सिस्टम में रहेगा तो सीख जायेगा। अभी उड़ने दे, सब वापस यहीं आते हैं।”

रीटेस्ट का दिन आया। बेचारे गुरुदेवों को तरह तरह की दलीलें दे देकर परीक्षाएं ली गयीं। उधर से एक निकम्मा लौंडा निकला और ये कहता हुआ निकल गया, “मास्टर साहेब, पास कर देना वरना दुबारा टेस्ट लेना पड़ेगा। ही ही ही… ” मास्टर नारियल पानी पीकर अपनी विवशता को ठंढा कर रहा था।

कॉपिया चेक होने के लिए आई। और वही स्थिति, कही एक लाइन सही लिख दी, किसी ने नाम लिख कर एहसान जाता दिया तो किसी ने हर पैराग्राफ में एक ही बात लिखी। और नहीं तो क्या इनसे आप नोबेल प्राइज विनिंग बुक एक्स्पेक्ट कर रहे हैं!!! कमाल करते हो पाण्डेय जी!!!

नए मास्टर ने कॉपी खोली और नंबर लगाये, “ढाई, पौने तीन, साढ़े सात, आधा, एक बटा चार…” बात वही है कि कौन किसकी कितनी और कब किस किस तरीके से लेता है। नया मास्टर मनमौजी है, कमीना है, उसे न कभी फर्क पड़ा न पड़ता है, वो कहीं छह महीने तो कहीं नौ महीने टिकता है। हर जगह उसकी लड़ाई सिस्टम से है। या तो सिस्टम झुकता है या नया मास्टर नयी जगह चला जाता है।

कहते हैं गुरुकुल उस मास्टर को बर्दाश्त नहीं कर पाया क्योकि वो उनके बताये रास्ते पर नहीं चला। निकम्मे लौंडो को आज भी डिग्री मिल रही है। और वो मास्टर आज भी एक जगह से दूसरी जगह नौकरी छोड़ और पकड़ रहा है क्योकि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता की बाकी दुनिया किधर चल रही है। उसे रास्ता पता है और उसे ये भी पता है कि जिस रास्ते ज्यादा लोग चल रहे हो वो ज़रूरी नहीं है कि सही हो।

बताया जाता है कि वो मास्टर मर गया और उसे जला दिया गया। जब राख टटोली गयी तो एक स्टील की रीढ़ मिली जिसमे सिस्टम की जंग नहीं लग पायी थी।

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4 thoughts on “नए मास्टर की रीढ़

  1. बताया जाता है कि वो मास्टर मर गया और उसे जला दिया गया। जब राख टटोली गयी तो एक स्टील की रीढ़ मिली जिसमे सिस्टम की जंग नहीं लग पायी थी।……is line pe jaan bhi di ja sakti hai master ji….hukm kijiye ek baar…..invicible piece….kudos!!!!!

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