और फिर बारिश हुई

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और फिर बारिश हुई
बेतरतीब बूँदे गिरती रही
तुम्हारे बलखाये बालों पर
जो सीधी होकर
तुम्हारे सौंदर्य की धार
अपने छोरों से बहाती हुई
हर जगह गिरा रही थी
और जहाँ जहाँ वो बूँदें गिरीं
बहार आ गयी

वो बूँदें
जो तुम्हारी भवों को छूकर
पलकों से रिसती हुई
गालों से ढलकर
होठों तक पहुंची
थोड़ी देर लटक कर
न चाहते हुई गिर पड़ी
और जहाँ जहाँ वो बूँदें गिरीं
बहार आ गयी

जो उस मद्धम बरसात में
बाहर की दुकान से
एक कप चाय ली थी
जिसमे टप टप
वो निष्पाप, निश्छल, निर्मल बूँदें
गिरती रहीं
और तुम पीती रहीं
शायद वही निर्मल, निश्छल बूँदें हैं तुम्हारे अन्दर
जो तुम्हारे पूरे वजूद के
सौम्य, शांत और स्नेहिल होने का
आधार हैं

और फिर बारिश हुई
फिर मैंने तुम्हे देखा
अपने घर की बालकनी में
छत से गिरती बारिश को
मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश में
जिस जिस बूँद को तुममे छुआ
चमक उठीं

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