बीजेपी, कांग्रेस और ग़रीबी की राजनीति

बीजेपी अपने रंग में आ रही है और कांग्रेस की इसी बात से फट रही है. एक तरफ कांग्रेस के पॉलिश्ड नेता लोग हैं जो ठीक से हिंदी नहीं बोल सकते लेकिन सत्ता में कैसे बने रहना है ये उन्हें बखूबी मालूम है. दूसरी तरफ बीजेपी के लोग हैं जो क्षेत्रीय भाषा से लेकर हिंदी और अंग्रेजी में न सिर्फ चैनलों पर बोल रहे हैं बल्कि लेख, ब्लॉग और सोशल मीडिया का समुचित उपयोग भी कर रहे हैं.

कांग्रेस के चुप रहने वाले प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर पर स्वीकारा है कि उनका एक साल खराब प्रदर्शन रहा. इस बात को हमें उसी तरह देखना चाहिए जैसे की सरकार का ये कहना की केदारनाथ आपदा में करीब हज़ार लोग मारे गए.

ख़ैर बीजेपी का प्रोपोगेन्डा जो भी हो, चाहे खुल्लमखुल्ला हिन्दुत्व की बोली या सोशल मीडिया पर सरकार की नीतियों की खोज खोज कर आलोचना पर इस पार्टी ने इस बात को झुठला दिया है कि बीजेपी के पास न कद्दावर नेता है न ही कांग्रेस से लड़ने के लिए मुद्दा।

बीजेपी के पास राजनीति के लिए सबसे बड़ा मुद्दा स्वयं कांग्रेस पार्टी ही है. इस बात को बीजेपी ने देर से ही सही पर पहचान लिया है. वो कोई भी और मुद्दा उठा ही नहीं रही बस कांग्रेस के (कु)कर्मों को गिना रही है.

और कांग्रेस बड़े आराम से अमूल माचो पहन कर पूरे अपर और मिडिल क्लास और उसके तमाम मुद्दों को दरकिनार करते हुए, बड़ी चालाकी से सिर्फ लोअर क्लास को तन्मयता के साथ देखने में लगी हुई है. अपनी सिक्योरिटी बचाने के लिए तरह तरह के सिक्योरिटी बिल्स और गरीबों का जीर्णोद्धार करने वाले (कम से कम पेपर पर) योजनायें बना रही है.

अब देखना ये है कि बीजेपी बिल्कुल खुल कर चाणक्य नीति अपनाती है या कांग्रेस अपना नंगापन दिखाते हुए सारे महत्वपूर्ण मामलों से दूर अपने अघोषित लक्ष्य (ग़रीबों को ग़रीब ही रहने दो) की तरफ़ तल्लीनता से लगी रहती है.

दरिद्र को दरिद्रनारायण कह देने से वह नारायण नहीं हो जाता। इस देश में ऐसी बेवकूफ़ी काफी समय से चली आ रही है. ग़रीबी एक कोढ़ है और पार्टियाँ (ख़ास करके कांग्रेस जो की पिछले 6 दशक से ‘ग़रीबी हटाओ’ ही कह रही है) इस कोढ़ को ख़त्म नहीं होने देतीं।

ग़रीबों को ग़रीब ही रहने दो. ग़रीबी में एक आशा है की एक दिन तुम अमीर हो जाओगे लेकिन अमीरी में वो आशा नहीं है. अमीर लोगों को कैसे ठगोगे? क्या कहोगे उन्हें? गरीबों को तो कह सकते हो, कहते रहे हो साठ-सत्तर सालों से, गरीबी हटा देंगे लेकिन नहीं हट रही.

ग़रीबी नर्क है और ग़रीब उसमे घुटता रहता है. उसे आशा देना सबसे आसान कार्य है. वो पीढ़ियों से इस ग़रीबी को झेल झेल कर इतना तंग आ गया है कि उसे कोई भी ये आशा दे दे की हम तुम्हे ये दे देंगे, हम तुम्हे वो दे देंगे, वो खुश हो जाता है की चलो कुछ दे ही रहा है. लैपटॉप दे दो लेकिन बिजली मत दो, पढाई न करे उसका बच्चा …

यही तो राजनीति है. लालू ने बिहार में यही किया था. निचले तबके, जो आम तौर पर ग़रीब पैदा होते हैं और ग़रीब ही मर जाते हैं, को शिक्षा से बहुत दूर रखा था. स्कूल में शिक्षक ही नहीं थे, स्कूल की बिल्डिंग ही नहीं थी, गरीबों में ये एक अफवाह और उड़ा दी की पढने से अच्छा वो किसी के खेत में जायेगा तो कम से कम कुछ कमा कर तो लायेगा!

ऐसे में कौन पढ़ेगा? इन्हें अपनी मूर्खता में ही जीने दो और इसी आशा में मर जाने दो कि ये सरकार उसके हित में कुछ करेगी। कांग्रेस या ऐसी पार्टियों को अगर कोई चीज जिताती है तो वो है ये आशा, ग़रीबी हटाने की. गरीब ये बात समझ नहीं रहा. गरीब ये बात समझ भी नहीं सकता।

नरेगा के तहत जब उसे घर बैठे, ज्यादातर, जीने लायक पैसे मिल ही रहे हैं, उसके लाल कार्ड पर सस्ता चावल-गेंहू हर महीने मिल ही रहा है तो वो क्यों गरीबी से बाहर आना चाहेगा? ये योजनायें इस उद्देश्य से बनायीं गयीं की समाज का सशक्तिकरण हो, गरीबों को खाने को मिले पर एक नयी तरह की बरोजगारी हो रही है.

लेबर का बच्चा लेबर ही बनता है, वो स्कूल नहीं जा रहा. खूब शिक्षा का ढोल पीट रहे हैं लेकिन स्कूल में एनरोलमेंट नहीं बढ़ रहे, मिड-डे मील के कारण कुछ बढ़ा भी है तो वो सिर्फ खाने के लिए.

समाज का विकास सिर्फ और सिर्फ इस ग़लत आशा को मार कर किया जा सकता है. उसके लिए सैफरन टेरर, आतंकवाद, इकनोमिक ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे शब्द वैसे ही खोखले हैं जैसे की पंडितों, मौलवियों और पादरियों का भगवान के पास जाने का जरिया। उसको धर्म, विज्ञान, विकास से कोई लेना देना नहीं है. उसकी बुनियादी जरूरत है मोक्ष: ग़रीबी से मुक्त होने की उस आशा को जीतना!

जब तक ग़रीब दूसरों के आने और ग़रीबी मिटाने की बाट जोहता रहेगा वो ऐसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी ही आशा की बलि चढ़ता रहेगा।

#congress #BJP #Poverty #Gareebi ki rajneeti

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