संवेदनशून्य मैं

आमतौर पर मैं आज़ादी या किसी और भी खुश होने वाले दिन खुश नहीं होता। कारण मुझे पता नहीं और न कभी मैंने इस विषय पर कोई आत्मचिंतन किया है । हो सकता है कि मुझे ज़रूरत महसूस न हुई हो। होने को तो प्याज का दाम भी कम हो सकता है और देश की सरकार भी अच्छी हो सकती है ।

अच्छे तो हम भी हो सकते हैं और इस ‘देश’ नामक शब्द विशेष के लिए कुछ कर सकते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं । सड़क पर थूकते रहो और बात कर दो बिजली पानी की, कचरा फेंको गलियों में और गाली दे दो नगरपालिका को, दोस्तों के लड़की को ‘मैंने ये कर दिया चलते चलते’ कहानी पर मजे लो लेकिन इंडिया गेट पर रेप के लिए कैंडल ज़रूर जलाओ, स्टंट के चक्कर में अपने मुसलमान और हिन्दू होने का फायदा उठाकर पूरी ट्रैफिक की बैंड तुम बजाओ और गालियाँ दो नाकाम पुलिस को…

एक तो ये देश-वेश का टंटा ही मेरी समझ से बाहर है। ये साले देश बने ही किस लिए हैं? मेरे हिसाब से देश का फ़ालतू कोंसेप्ट देशभक्तों को पहचान देने के लिए बना है। पहले देश बनाओ, फिर लड़ झगड़ कर रहो, बगल के देश से बिना बात के पंगे लो, सैनिकों के सर काटो, कमज़ोर और बेबस लोगों की बहु-बेटियों का बलात्कार कर लो, आर्मी और पुलिस पर पत्थर फेंको, वीज़ा का पंगा ले आओ, प्रजातंत्र का बिगुल फूँको और चुनो सरकार, अब उसे गालियाँ दो क्योकि प्रजातंत्र तुम्हे ये अधिकार देता है …

आधी जनता तो पीछे भागने के लिए पागल है। ये अन्ना हो गए, नए महात्मा गाँधी! कोई केजरीवाल आयेंगे और बेचारे अन्ना को बताये बिना 11 दिन का अनशन करा देंगे। आम जनता पागल हो रही है। “डिड यू गो टू सपोर्ट आन्ना? ही इज़ डूइंग ईट फॉर अस, वी मास्ट गो, या एक्चुअली, आहां, आहां, हूँ, या, याँ, आहां ”

व्हाट द ब्लडी फ़क! फर्जी के विचार और फ़र्ज़ी विचारधाराएँ। अबे काहे का करप्शन और किस बात की मुक्ति चाहिए? भाई यही लोकतंत्र है! सौ में साठ वोट देते हैं, उसमें से 10 पार्टी लड़ती है, जिसको 15 वोट मिले वो मेजोरिटी से जीत जाता है! ये कैसी मेजोरिटी है भैया? 15 लोगों के वोट से सौ लोगों के लिए सरकार बनी और वो मेजोरिटी है!

स्वंतन्त्रता दिवस को मैं खुश हूँ या दुखी, मुझे पता नहीं। खुश होना चाहिए या नहीं इस पर भी मैं कोई राय बना नहीं पाया हूँ। पिछले साल तक मैं गालियाँ देता था कि किस बात का जश्न है ये? ये तिरंगी पतंगे क्यों उड़ा रहे हो? ये कवर पिक और टैगिंग का बंदरबांट काहे का है? मुझे इसका जवाब नहीं मिला कभी और मैं खुद को भी कोई जवाब नहीं दे पाया।

मेरे कुछ जानकार मुझे ज्ञानी मानते हैं, कुछ विशुद्ध चूतियों की श्रेणी में डालते हैं, कुछ का मानना है कि मैं बहुत नेगेटिव आदमी हूँ, कुछ नासमझ कहते हैं और कुछ ब्ल़ेटेंटली इग्नोर करते हैं और कुछ को विश्वास है कि मैं पागल हूँ और पता नहीं क्या फ़िज़ूल की बातों में दिमाग ख़राब करता रहता हूँ।

मैं इन सब को सही मानता हूँ क्योकि इस नाम से मुझे नामित करने के लिए उनके पास कई कारण होंगे।

लेकिन एक बार यही सवाल जब खुद से पूछता हूँ तो कुछ कुछ समझ में आता है। झंडे को देख कर मुझमें उन्माद क्यों नहीं आता? सैनिकों के मरने पर शोक क्यों नहीं होता? पाकिस्तान की गोलीबारी पर गुस्से से मेरा खून क्यों नहीं खौलता? मुझे इंडिया गेट जाने से चिढ क्यों हैं? करप्शन की बातों पर मेरा मौन क्यों?

शायद मैं संवेदनशून्य हो गया हूँ या कर दिया गया हूँ!

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