Happy Rakshabandhan, is it?

लगभग सोलह साल हो गए कि मेरी बहन ने हाथ पर राखी नहीं बांधी। आमतौर पर वो मुझे राखी भेज देती थी या कभी कभी देर से पहुँचती थी तो मेरी राखी उसी दिन होती थी। कभी कभी ये भी हुआ कि मैंने कह दिया कि तेरे नाम से खरीद कर बाँध लूँगा तू भेजने की झंझट मत कर। वो इसमें भी मान जाती थी और इस साल भी मान गई।

हमेशा पढाई के चक्कर में सैनिक स्कूल, तो कभी दिल्ली में रहा और ऐसे ही मनाता रहा। न कभी उसने गिफ्ट माँगने का अधिकार जताया (जबकि मुझसे छोटी है) और न ही मैंने ‘राखी का गिफ्ट’ है कह के कुछ दिया। सोचता हमेशा था कि छोटी बहन है ये उसका हक़ है और मेरा फ़र्ज़।

लेकिन भाई बहन में कैसा हक और कैसा फ़र्ज़? बचपन में तो माँ ही पैसे देती थी की दे दो उसको, बाद में तो घर ही छूटा। न माँ रही, न बहन, न मैं! अब जब घर जाता हूँ, उसकी कही और अनकही सारी जरूरतें मेरी जिम्मेदारी हैं। उसे क्या चाहिए वो मांगती नहीं, मैं समझ लेता हूँ। जो मेरी समझ से परे है वो माताजी बता देती हैं।

बचपन में वो मुझे पीटती भी थी, कभी कभार आज भी जब मैं उसे चिढाता हूँ!

बहन, माँ ये सब बेशर्त प्रेम करते हैं! इनका दिल इतना विशाल होता है कि कई कायनातें समा जायें। ये हमारा अहित कर ही नहीं सकते, ये भावना उनमे होती ही नहीं या शायद कुदरतन उनमे ये क्षमता ही नहीं होती।

सबकी बहन दुनिया की सबसे प्यारी बहन होती है। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि रूपये का भाव गिर रहा है, देश कि इकॉनमी ख़तरे में है, राजनीति गर्त में है …

वो जानती है आज छुट्टी होगी और भैया सो रहा होगा इसीलिए उसने फ़ोन भी नहीं किया। राखी साल का एक ही ऐसा दिन है जब मैं स्वेच्छा से नहाता हूँ। ये अपने लिए नहीं करता, ये मेरी बहन के लिए है जो मेरे लिए हमेशा खड़ी रहती है। छोटी होकर भी पापा से लडती है, उन्हें मेरी ज़रूरत के लिए इमोशनल ब्लैकमेल भी करती है।

वो तो इसमें भी मान जाये की अगर मन नहीं है तो मत नहाओ, लेकिन एक ही दिन तो मन करता है।

But today when the society has made advancements to make women’s life hell, a society where people slice a woman’s being by their constant staring, gazing at their breasts, groin, hips, masturbating in running metro trains, stalking them in physical and cyber world, raping her and inserting a rod in her vagina, constant rape of young girls in family by own relatives….

Are the sisters safe? We have made their lives hell.

मैं ख़ूब बड़ा इन्टेलेक्चुअल हो गया हूँ, लेकिन क्या वास्तविकता में मेरी, हमारी, आपकी ये बुद्धिजीविता, ये संवेदनशीलता कोई मायने रखती है जब आप ये पढ़ रहे हैं और कोई अपनी बीवी पर अपने पुरूषत्व का प्रहार कर रहा होगा, कोई राह चलती लड़की पर एसिड फेंक रहा होगा, कोई भरी बस में किसी के कूल्हों पर थपकी कर निकल रहा होगा…

मैं ख़ुश हूँ कि मेरी बहन सेफ़ है, क्या पता कल को कोई कुछ कर दे! लेकिन क्या सभी की बहनें सेफ़ हैं, सुरक्षित हैं, बेख़ौफ़ दिल्ली के आॅफ़िस में जाती हैं जहाँ बाॅस उनका मानसिक या शारीरिक शोषण कर अपनी फ़्रस्ट्रेटेड सेक्सुअल मानसिकता को शांत नहीं करता?

जवाब है नहीं। बात है कि अपनी बहन तो सबसे प्यारी है पर दूसरे की बहन हममें से कईयों की रिप्रेस्ड हवस को शांत करने का ज़रिया।

Is it right? Have we grown enough to let this cancerous repressed sexuality out of the system?

No, it will perhaps take another few decades when we, Indian society which was so open to sex with Khajuraho and Konark as the history suggests, will be able to talk about it freely hence letting the repression out and be able to handle rejection from a girl properly without dangerously hurting his virility and macho-ness.

Lets celebrate a beautiful #Rakshabandhan

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