अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

अच्छा है कि कान बंद हैं तेरे
आँखें देखना नहीं चाहती
ये चमड़ी वो ठंढ महसूस नहीं कर रही है
और अंदर की आग बस बुझने ही वाली है
यहाँ के लिए तुम सही नहीं हो

अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

तुमने गुलाबी होंठों की बात की, तो वो ख़ुश हुए
तुमने आँखों पर क़सीदे लिखें, तो वो ख़ुश हुए
तुमने टूटे दिल की कही, तो वो ख़ुश हुए
तुमने प्रेमगीत लिखें तो वो ख़ुश हुए
लेकिन सच क्या बस यही-वही हो?

अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

ड्राईंग रूम में रखा गुलाब बेहतर है
और बेहतर है उसकी प्लास्टिकिया गंध
बग़ीचे में से लाया गुलाब काँटे देता है
और वो चुभन जो याद रहती है
बेहतर है घर में बग़ीचे का वो गुलाब भी कहीं हो!

अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

हमें आदत है अच्छे होने के रोग की
आदत है तह-दर-तह मुखौटे ओढ़ने की
ओढ़ने की उस ख़ाली मुस्कान को
ख़ाली दिल की जहाँ ठंढा ख़ून बस बह ही रहा है
और मैं कहता हूँ जो अनकही रही हो

अच्छा है जी, तुम कवि नहीं हो!

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