लूज़िंग बार-जिनिटी: बार भ्रमण वृत्तान्त (Losing Bar-ginity: Story of my first visit to a bar)

20140119-133724.jpg

कल ज़िंदगी में पहली बार हम एक बार में गये, नाम था ‘माय बार’। अंदर के माहौल को देखकर दोयम दर्जे का लगा, ड्रिंक्स की काॅस्ट देखकर कन्फर्म हो गये। लेकिन हम कौन सा युवा नेता श्री राहुल गाँधी के बहनोई हैं जो फ़ाईव स्टार बार में जाएँ!

ख़ैर हम अपने दस दोस्तों के साथ, महिला समेत, घुस गए अंदर। एकदम अंदर चले गए। कोई मारपीट गाली गलौज नहीं हो रहा था, किसी ने भी माँ क़सम बीयर एक दूसरे पर नहीं फेंका। समझ में आ गया कि यहाँ लोग सच में पीने ही आते हैं। वही आते हैं जो जितना पैसा देते हैं उतना का दारू-चखना सब चाट-पोंछ के ख़त्म कर देते हैं।

माहौल नीली रोशनी में नहाया हुआ था। बंदे डिसाईड कर रहे थे कि क्या मँगाया जाय। बक़ौल हम उन सब का मुँह ताक रहे थे। दो ओल्ड मोंक, चार हन्ड्रेड पाईपर्स, दिस एंड दैट विथ हनी चिली पोटेटो…

पापा क़सम हनी चिली पोटेटो सुनकर मेरे मुँह में पानी भर आया। उसके बाद का आॅर्डर ना हमें सुना न ही सुनना था। चलो कुछ हमारे खाने लायक भी आएगा। छीली हुए मूँगफलियाँ भी मँगवाई गईं, वरूण को पसंद नहीं आए, उसने कहा, “यार, मसाला पीनट लेकर आओ!”

सुनकर दोबारा मज़ा आ गया। मसाला सुनकर ही मुझे मज़ा आ जाता है। मुझे पता था कि सबसे ज़्यादा खाऊँगा तो मैं ही, बाक़ी पीने में मशगूल रहेंगे, मैं तो सिर्फ़ खाऊँगा! उनकी बातों में पार्टिसिपेट करते रहो और काँटे से चिली पोटेटो लेते रहो, लिटिल-लिटिल।

तभी ऐसा कर्कश आवाज़ आयी आॅडियो सिस्टम से कि माथा ख़राब हो गया। ऐसी घिसियाई हुई आवाज़ मानो कैसेट फँस गया हो। पता चला ईडीएम है। हमने ज्यादा जानने की कोशिश नहीं की।

एक टीवी भी था, वही बड़ा वाला। बेचारा दिखा रहा है कुछ लेकिन उसका दुर्भाग्य कि कोई देख नहीं रहा। उसपर पागलपन ये कि म्यूट कर देते हैं ऐसे टीवीयों को। क्यों करते हैं पता नहीं। शायद बोर होके टीवी गलिया न दे, “सालों सिर्फ़ पियो मत, हम भी हैं इधर, देखो हमें! साले कैलेंडर नहीं है, बयालीस इंच के फ़ुल एचडी एलईडी टीवी हैं…!”

फिर आॅडियो सिस्टम ने हमारा ध्यान खींचा, कोई चाचीजी ‘आँ, आँ’ कर रही थी। क्यों कर रही थी, नहीं मालूम। टीवी पर ब्रिटनी स्पियर्स आईं। बत्तीस की हो गई होंगी लेकिन आज भी वही कर रही हैं जो सोलह साल में करती थीं। तब भी लुत्फ़ आता था, आज भी लुत्फ़ आता है। हारमोन्स थोड़े ना बदल जाएँगे, वो तो कुलाँचे भरेंगे ही ब्रिटनी को देखकर।

हमारे दोस्त ने हमारे लिए ख़ाली ग्लास मँगवा दिया और उसमें कोका कोला डाल लिया। लुक वाइज़ तो लगे कि बंदा कंपनी दे रहा है, सिर्फ़ पीनट कब तक खाएगा। हमारा कोक एक घूँट में बाॅटम्स अप उतर गया नीचे। अब क्या करें? अब हमने पानी डाल लिया और डिसाईड किया कि ये तीस-चालीस-पचास एमएल, जो भी है, एकदम टाॅर्चर करके पीना है। जब तक रमन का रम ख़त्म नहीं होगा, तब तक हमारा नीट वाटर नहीं।

वाटर तो हम नीट ही लेते हैं, रमन ने कहा कि भाई थोड़ी रम मार लो, किसी को पता नहीं चलेगा। बात पता चलने की नहीं है। बात सिद्धांतों की है। हम पानी नीट ही पीते हैं, कोई मिलावट पसंद नहीं।

फिर एक ने बोला (शायद रसेलवा था), “आप पीते नहीं, ये मानने वाली बात नहीं है। आप कविता कैसे लिखते हैं फिर?”

भाई मेरे कविता के लिए दारू का सहारा क्यों लेना। पापा क़सम कविता लिखते हैं, और पता है कि अच्छी लिखते हैं पर दारू की ज़रूरत नहीं पड़ी दुनिया को देखने के लिए। हमें वैसे ही इसकी सुंदरता, खोखलापन, बनावटी चेहरे, दिखावे की दोस्ती, चाँद लाने वाला प्यार, माँ का स्नेह… सब अनएडल्ट्रेटेड दिख जाता है। शराब की ना तो ज़रूरत हुई, न हमने पी।

लेकिन ऐसा नहीं कि मुझे पीने वालों से कोई घृणा है। पीकर उलटी करने वालों से है। कंट्रोल में पीजिए भाई, कल पी लेना फिर से। कौन सी दुनिया साला ख़त्म हुई जा रही है!

ये साला आॅडियो सिस्टम पर फिर कोई चीख़ रहा है! अरे पूछो कोई, क्या दिक़्क़त है। राम नाल भई, रौला ना पाओ, होली होली… हैं जी।

लड़कियाँ एक राउंड के बाद चली गईं। कुछ आई ही नहीं, जैसे कि अन्विता। बोली कि माँ ब्लेकमेल करती है ये कहकर, “घर आ जा, जी नहीं लग रहा…”

माँ लोग बहुत चालाक होती है। हमारी माँ भी ऐसी चालाकियाँ करती है। ताने मारेगी कि देख रही थी कि तू कितने दिन फ़ोन नहीं करता है, उधर दिल्ली की कटरीनाओं को तो ख़ूब करता होगा रोज़! अब माताजी को क्या बताएँ कि लौंडा डेढ़ साल से सिंगल है और ऐसी लड़की ढूँढ रहा है जो ग़ालिब नहीं तो कमसकम साहिर लुधियानवी को तो समझे। वो भी छोड़ो, कम से कम हमारी अपनी कविता जो हम उसके लिये लिखें वो तो समझे!

साला जो समझती है वो पहले से ही इंगेज्ड है, कुछ आॅ-स्ट्रक हो जाती है मुझे जान कर और मैं साला ओवरक्वालीफाईड टाईप फ़ील करने लगता हूँ! सर्दी में सिंगलहुड का पेन बड़ा ही टीस मारता है जी, मत पूछिए!

एक सज्जन आए और बोलने लगे कि ये एरिया जो है वो सिर्फ कपल्स के लिए है, और हमारी लड़कियाँ निकल गईं इसीलिए हमें दूसरी जगह जाना होगा।

क़सम से मन में उस वक़्त माँ वाली दो, और बहन वाली चार गालियाँ जीभ पर आकर परमिशन माँगने लगीं लेकिन हमने मन को समझाया कि ये बार है, नाम ़’माय बार’ है लेकिन दूसरे का है! फिर हमने सोचा कि सेंसिबली समझाते हैं कि इतना सामान कहाँ ले जाएँगे, लेकिन फिर याद आया कि ‘बार’ और सेंस आॅक्सिमोरोन हो जाएगा!

हम डिसाईड ही कर रहे थे कि वो चला गया। दूसरा आया और आते ही वरूण (छोटा वाला, नाम नहीं है ये पारसी टाईप, बेचारे की हाईट कम है। नाम है वरूण गुप्ता और दो वरूण गुप्ता एक टेबल पर दारू पी रहे थे। कितनी प्रोवेविलिटी है केलकुलेट कर लो!) ने बोला, ”भाई हुक्का ले आओ और लास्ट आॅर्डर ले लो।”

मैंने ये ग़ौर किया कि हमारे सारे दोस्त दारू पी रहे थे। किसी ने कोई गाली गलौज नहीं की। किसी पर ग्लास नहीं फेंका। बड़े ही तमीज़ से सारा काम हो रहा था। वर्ना हमने जन्मदिन की पार्टियों में बीयर की बोतलें सर पर पड़ती देखीं हैं!

सब पीने में मशगूल थे, हम जो है सारा टेक्स (बीस परसेंट वैट, फिर उसपर बारह परसेंट और वैट) का पैसा सधाने में (कंज्यूम करने में) लगे थे। म्यूज़िक सुनो, उस पर गर्दन हिलाओ, टेबल पर थपकियाँ दो ताकि लोग समझें कि म्यूज़िक की समझ है। फिर टीवी भी देख लिया। नज़रें चुरा कर लाईटिंग का भी आनंद लिया। कुल मिलाकर हमारे दोस्तों का एक भी पैसा बेकार नहीं हुआ। साला चिली पोटेटो के प्याज़ और कैप्सिकम का एक टुकड़ा, जी हाँ एक टुकड़ा, तक नहीं छोड़ा!

पैसा चुकाया दोस्तों ने। हमसे ना माँगा, न हम देने की स्थिति में थे और न ही देते! सबने अपना अपना चुकाया और निकल लिये बाहर।

ये थी हमारी ‘बार-जिनिटी’ लूज़ करने की कहानी। कभी पिया तो उसकी कहानी भी लिखेंगे, क्या पता काॅलरिज़ टाईप क्लासिक सी ‘कुबला खान’ ही लिख दें। उसने तो गाँजा पीकर लिखी थी वो, इनकंप्लीट है पर अंग्रेज़ी की सबसे अच्छी कविताओं में शुमार है।

Advertisements

Did you like the post, how about giving your views...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s