‘Organised’ protest is a farce

नाईदो तानिया की मौत सर और चेहरे पर लगे चोटों से हुई। तीन दिन पहले जंतर मंत्र गया था। कुल मिलाकर सौ लोग होंगे। मैंने कुछ लोगों को बोलते हुए सुना। इप्सा आपके साथ है, फ़लाँ स्टूडेंट यूनियन आपके साथ है।

कुछ लोग उत्तर प्रदेश से आए थे। दुर्भाग्य ये कि मेरे बालकनी के सामने वाले कमरे में कुछ नार्थ-ईस्ट के लोग रहते हैं वो नहीं गए।

ग़ौरतलब बात ये भी थी कि प्रोटेस्ट को सरकार ने एक व्यवस्थित तरीक़ा दे दिया है। प्रोटेस्ट कहीं व्यवस्थित होता है क्या? पूछ कर, जगह माँग कर, समय बता कर, दरी बिछा कर विरोध या रोष प्रकट नहीं किया जाता।

आम आदमी के जेब से जब उसके एक दिन की सेलरी जाती है तो प्रोटेस्ट का मतलब नहीं रहता। जब उसे सिद्धांत और सत्य तथा सेलरी में चुनने पर मजबूर होना पड़े तो वैसी सरकार में प्रोटेस्ट एक क्रूर मज़ाक़ और भद्दी गाली बनकर रह जाती है।

जब मैं कहता हूँ कि लोकतंत्र के सही तरीक़े से चलने के लिए आम आदमी की अराजकता समय समय पर बहुत ज़रूरी हो जाती है। पर विविधता भरे इस देश में किसी एक क्षेत्र विशेष के लिए इकट्ठा होकर खड़े होने के लिए बहुत मैच्योरिटी चाहिए जो हमारे ‘जगद्गुरू’ समाज में अभी नहीं आई हैं।

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