MTNL में जब छः में चार लाईनमेन छुट्टी पर हों…

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(ये वही बिना माय-बाप का MTNL का पोल है जहाँ तार ऐसे ही झूलती रहती है)

सोमवार की सुबह हमारा MTNL का फ़ोन मर गया। आवाज़ आनी बंद हो गई। इस कारण इंटरनेट भी चला गया। थोड़ी देर इंतज़ार किया की हो सकता है ख़ुद ही ठीक हो जाए। आमतौर पर ऐसा नहीं होता। और हुआ भी नहीं।

फिर छोटे भाई को दौड़ाया कि जाकर देखो मुखर्जीनगर एक्सचेंज और कंप्लेन कर आओ। वहाँ उन्होंने फ़ोन पर १९८ डायल करके दे दिया और कहा ‘यहाँ कंप्लेन कर दीजिए। आज तो वैसे छः में से चार लाईनमेन छुट्टी पर हैं पर कोशिश रहेगी कि आज हो जाए नहीं तो कल पक्का है।’

भाई आ गया, लाईनमेन नहीं आया। सुबह हुई। दोपहर हुई। हम ख़ुद गए एक्सचेंज। सरकारी लोग हैं, फ़ोन बज रहा है, कोई चिंता नहीं, सब ठीक है। हमने कल की कंप्लेन याद दिलाई तो वो ख़ुद का रोना रोने लगे कि देखिए लाईनमेन ही नहीं हैं हम क्या करें!

बात तो ठीक है पर हम क्या करें ये कोई ना बोले। ‘आप राय जी नीचे होंगे उनको बता दीजिए वो किसी को भेज देंगे।’ हमने राय जी को ढूँढा, बात बताई। उन्होंने कोई इंटेरेस्ट नहीं लिया। फिर मैं उनके साथ ऊपर गया। वहाँ सीनियर अफ़सर ने कहा ‘यार इनका कुछ कर दो, कल से ही आ रहे हैं। टैगोर पार्क वाले लाईनमेन को इधर भेज दो। कम से कम जो ख़ुद कंप्लेन करने आ जाएँ उनको अर्जेन्टली डील किया करो।’

मुझे तसल्ली हुई कि सही बंदा है। बक़ौल राय जी ने रजिस्टर में मेरा नाम, नंबर, पता लिख लिया। मैं फिर भी नहीं हिला। फिर उन्होंने एक लाईनमेन को फ़ोन करके मेरा पता बताया और गिड़गिड़ाकर कहा कि यार ये देख लेना प्लीज़!

मुझे लगा आज हो जाएगा काम। शाम हो गई और कुछ नहीं हुआ। ग़ुस्सा आया मुझे और मैं उसमें ज़ीरा पाऊडर मिलाकर पी गया। सरकार से ग़ुस्सा होने पर आम आदमी को यही करना चाहिए। सड़क पर थोड़े उतर जाएँगे?

अगली सुबह हुई। सनद रहे कि ये तीसरा दिन है। दिल्ली में जवान आदमी के घर में इंटरनेट नहीं होने की पीड़ा बाँझ स्त्री जैसी होती है जिसे हर बाबा ठगता है कि जा अब बच्चा होगा। ना बाँझ को बच्चा होता है और न ही सरकारी तंत्र में तय समयावधि में काम।

हमने पहले तो लाईनमेन को ख़ुद फ़ोन किया। उसने कहा आज उसकी छुट्टी है। ये नहीं कहा कि आज सरकारी छुट्टी है। हम खौंझाए हुए मुखर्जीनगर एक्सचेंज चले गए। वहाँ ताला बंद था।

हमने उसी समय तय कर लिया कि अब ठीक तो ख़ुद ही करेंगे। बत्रा आए, जादबजी को फ़ोन किया, उन्होंने काट दिया। फिर हम अकेले जाकर चिकन रोल खा लिए। अब आ गए वापस रूम पर।

एक नेलकटर लिया और अपनी तार की लंबाई नज़र में रखते हुए और वो किधर जा रही थी ये खोजते हुए वहाँ पहुँचे जहाँ से दिक़्क़त थी। वो जगह हमने कल भी देखी थी पर ये नहीं पता था कि हमारा तार कौन है और ख़ुद ही ठीक करना उचित होगा या नहीं।

भईया जब ग़ौर से देखा तो पाया कि तार टूटा झूल रहा था हमारा। माँ क़सम ये आँधी में हुआ होगा या किसी के नालायक लौंडे ने खींच दिया होगा। जो भी हो हमने देखा कि एक और तार (किसी और का होगा) वो जुड़ा था मेन तार से। मेन तार में तीन कलर की पतली तारें थीं: हरी, नारंगी और पाँच सफ़ेद।

जो तार जुड़ा था उसका एक तार (टेलीफ़ोन वायर में दो तारें होती हैं ना) नारंगी के साथ था और एक उजाले के साथ। उजली तारें पाँच थीं। हमने अंदाज़ा लगाया कि ये अलग अलग नंबर के लिए होंगी। नेलकटर से तार छीला अपना वाला और एक नारंगी में जोड़ा, दूसरा सफ़ेद में।

ऊपर से भाई झाँक रहा था, मैंने पूछा, “आया?”

भाई ने कहा, “हाँ, चल गया…”

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