हिंदी की ‘सेकेंड कमिंग’ (Second Coming of Hindi)

चाहे यीसू मसीह की ‘सेकेंड कमिंग’ ना हुई हो पर इस मुहावरे को हम हिंदी (देवनागरी लिपि) की वापसी के लिए कर सकते हैं। मध्य, उत्तरी और पूर्वी भारत में हिंदी बोली जाती, लिखी जाती है पर काॅन्वेंट्स के आगमन और अंग्रेज़ी में सम्मान देखने के चक्कर में हिंदी का लगातार ह्रास होता रहा।

नब्बे के दशक से नई सहस्त्राब्दि को पहले दशक तक हिंदी की हालत खस्ता हो गई थी। उदारीकरन के बाद बाहरी बाज़ार और अंग्रेज़ी के शिक्षा व्यवस्था में आने से बहुत सारे शब्द आम हो गए थे और नई पीढ़ी उनकी हिंदी ना तो जानती थी और ना ही जानने की कोशिश करती थी।

सीबीएसई की परीक्षा और सिलेबस को लगभग पूरे देश में अपनाने के कारण हिंदी दसवीं तक के बजाय आठवीं में छोड़ी जा सकती थी। हिंदी, संस्कृत की राह पर जा रही थी। टीवी मीडिया वाले बोलचाल में बदलाव कर रहे थे पर समाचार पत्रों में अभी भी उसी क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग हो रहा था जो एक पीढ़ी की समझ से परे था।

केबल टीवी की लोकप्रियता बढ़ी और यहाँ न्यूज़ हिंदी में सुनने वाले चैनल को दोखने वाले ज़्यादा थे, और इसे समझकर धीरे धीरे टीवी पर अंग्रेज़ी के शब्दों का समावेश होने लगा। हिंदी अख़बार, पत्रिकाएँ, ख़ासकर साहित्यिक पत्रिकाओं ने अंग्रेज़ी ना इस्तेमाल करने की ठानी हुई थी और इससे हिंदी भाषा को बहुत नुक़सान हुआ।

हिंदी लेखन बिल्कुल गौण होने लगा था। कंप्यूटर घरों में पहुँच रहे थे, फ़ोन हाथों में आ रहा था। अब एसएमएस का दौर था जिसमें नई पीढ़ी रोमन में हिंदी टाईप करने लगी थी। ये प्रचलन काफ़ी चला और आजतक चल रहा है। हिंदी को बोलचाल में रखने का बहुत बड़ा योगदान मोबाईल क्रांति को भी जाता है।

क़रीब पिछले दशक के मध्य में अख़बारों ने समझदारी दिखायी और वक़्त को समझते हुए अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों को धड़ल्ले से छापना शुरू किया। कईयों ने इसी चक्कर में पूर्णविराम के चिह्न डंडी को अंग्रेज़ी को फुलस्टाॅप में तब्दील कर दिया। पर बड़े मुद्दे को देखते हुए वो भी सही है।

भाषा का अद्यतन होते रहना चाहिए। अंग्रेज़ी ने हर भाषा के शब्दों को अपनाया और आज अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में तेज़ी से उभरी है। हिंदी ने भी पिछले दशक से ये समझदारी दिखाना शुरू की है और एक तरह से नया जीवन पाया है।

अब ज़रा प्रौद्योगिकी का इसमें कितना हाथ रहा इसे देखते हैं। मोबाईलों में टच कीपैड आने से आप हिंदी कीबोर्ड पा सकते हैं। ब्राउजर्स में आप छोटे से साॅफ्टवेयर की मदद से हिंदी में टाईप कर सकते हैं। आप रोमन में टाईप कीजीए और वो ‘ट्रांसलिटरेट’ होकर आपकी मनचाही भाषा में टाईप होगा।

इससे ‘हिंदी टाईप करना कठिन है’ की दिक़्क़त दूर हो गई। पर हिंदी को एक और टेक्नाॅलाजी ने आगे बढ़ाया है: सोशल मीडिया और ब्लाॅग ने।

अभी तक जो लोग सिर्फ़ पढ़ते थे यानि कंज्यूमर्स थे अब लिखने लगे और कंट्रीब्यूटर हो गए। ब्लाॅग पर लिखिए, लोग पढ़ते हैं। अब संपादक को चिट्ठी में रचनाएँ भेजने का दौर नहीं था। आप दो लाईन में ट्वीट कर दीजीए, दो पैरा, दस पैरा फ़ेसबुक वाॅल या पेज़ पर डाल दीजीए, लंबा है तो ब्लाॅग पर डाल कर लिंक शेयर कर दीजीए।

इससे लोगों में हिंदी पढ़ने की ललक जगी और अचानक से जिस हिंदी को पढ़ने से लोग कतराते या हेय दृष्टि से देखते थे आज वही एक ‘दूसरी भाषा’ के रूप में तेज़ी से उभरी है। हिंदी के जानकार को ‘अच्छा आप को हिंदी आती है’ कहकर थोड़ी बहुत इज़्ज़त से देखा जाने लगा मानो हिंदी नहीं कोई विदेशी भाषा हो।

ख़ैर अभी भी हिंदी भाषा को दोबारा मुख्यधारा में लाने के लिए बहुत मशक़्क़त की ज़रूरत है। हम भी अपने हिस्से का काम कर रहे हैं। बहुत सारे पेज़ हैं जो अधिकतया हिंदी में लिखते हैं। वेवसाईट पर हिंदी में ख़बरें मिल जाती हैं और आप वहीं अपनी प्रतिक्रिया हिंदी में लिख सकते हैं।

यही आशा है कि हिंदी जीएगी और ख़ूब जीएगी अगर समय और परिस्थितियों के अनुसार इवाॅल्व होती रहे तो।

Advertisements

Did you like the post, how about giving your views...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s