बधाई हो, बलात्कार हुआ है! (Badaun rape case)

बलात्कार पर राजनीति शुरू हो गई है। बलात्कार पर इस देश में राजनीति और मीडिया कवरेज के अलावा कुछ होता भी नहीं।

याद है दिसंबर २०१२ का निर्भया कांड? उसके बाद अगले मार्च तक बस बलात्कार ही होते रहे। बच्ची का बलात्कार हो गया, वृद्धा का बलात्कार हो गया, दलित का बलात्कार हो गया…

जी नहीं, मानवता का बलात्कार हो रहा था, हो रहा है और शायद होता रहेगा।

यही राजनीति और संवेदनहीनता आज के मीडिया में हो रही है। पंच बिठा दिये गए हैं, ख़बरी लगे हुए हैं, उदासी का मेक अप पोत लिया है एंकरों ने और गमगीनीयत का माईक लपेटकर रूआँसा कवरेज चल रहा है।

आदमी तो यहाँ संवेदनहीन है ही। इस संवेदनहीनता को बड़े ही नायाब अल्फाजों में ‘मूविंग आॅन विथ करेज़’ कह दिया जाता है कि ‘भाई, कल ही मुंबई में आठ ब्लास्ट हो गए पर आज से मुंबई चालू है। ये है असली मुंबईकर। ये होता है मुंबईया जीना। हम रूकते नहीं। हम हिम्मती हैं।’

जी नहीं, कोई हिम्मती नहीं हैं हम और आप। हम ख़ुश हैं कि हम बच गए। ये हिम्मत नहीं ये मिडिल क्लास की जीने और खाने की मजबूरी है। तुम चाहकर भी शोक नहीं कर सकते। इसीलिए तुम उस मेकअप विद्रूपित न्यूज़ एंकरान को देखकर संवेदनशीलता की झूठी शीतलता महसूस कर लेते हो।

हमारी संवेदना फ़ेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाईल पिक्चर्स में काला धब्बा लगाने तक सीमित है। जा रहे हैं माॅल में सिनेमा देखने और कमेंट में लिख रहे हैं कि कितना बुरा हो रहा है समाज में!

सबकी समस्या है। मीडिया बहुत ही सलीक़े से हमारे दिमाग़ को घुमाती है और हम घूमते हैं। रेप क्राईसिस सेंटर खोलने से क्या होगा? अरे जहाँ हज़ारों बलात्कार का पता भी नहीं चलता, जहाँ बलात्कार के बाद पेड़ पर टाँग देते हैं मारकर उनमें ये सेंटर क्या कर लेगा?

मैं निराशावादी नहीं हूँ। मैं परेशान हूँ हम सबकी संवेदनहीनता से। सबसे ज्यादा दुःख है मीडिया की तथाकथित संवेदना और कन्सर्न से। कल तक सिर्फ़ मोदी सरकार के किस मंत्री ने क्या कह दिया ये चल रहा था। अभी नई चीज़ मिली है, अब ये गन्ने के जैसा पेड़ा जाएगा।

दस-बीस या तीस दिन तक देश के तमाम हिस्सों के बलात्कारों का हमें पता लगता रहेगा। हमें मीडिया एक से एक क्रूर बलात्कार की धुँधली तस्वीर दिखाता रहेगा, हम काला गोला फ़ेसबुक पर लगाकर प्रोटेस्ट करेंगे, ज्यादा दुःखी हुए तो इंडिया गेट जाएँगे, वहाँ प्रोटेस्ट की सेल्फी लेंगे और हमारा डिजिटल संस्करण सरकार से सवाल पूछता रहेगा, हम ख़ुद सिनेमा का आनंद लेते रहेंगे।

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