औसतन, औसत लोग मर जाते हैं…

 

औसत इंसान, जिसे अंग्रेज़ी में ‘मीडियोकर’ भी कहते हैं, कौन है? डिकेंस, ‘हार्ड टाईम्स’ में, लिखते हैं कि रोज़ वही दिनचर्या, वही घर से निकलना, उसी फुटपाथ पर, उसी लय में पैर पटकते हुए, फैक्ट्री में जाना और आना, शायद ये परिभाषा है औसत इंसान की।

अजीब लगता है जब सुनता हूँ कि फ़लाँ सीनियर जो हिंदी बहुत अच्छी लिखता था, आज बैंक पीओ बना बैठा है और ज़िंदगी को ख़ुद के ऊपर से रोज़ गुज़रने दे रहा है। अपने हड्डियों की कड़कड़ाहट और पिसते हुए सपनों की घुटती आवाज़ वो रोज़ वैसे ही सुनता होगा जैसे हम में से औसतन नब्बे प्रतिशत लोग सुनते हैं।

सपनों के घुटने की आवाज़ तो नहीं होती पर वो घुन की तरह हमारी पूरी सोच और नज़रिये को खोखला कर हमें बेतरतीब दलीलों का दलाल बना देता है। हम अपने ही दोस्तों को अपनी दलील बेचते नज़र आते हैं। हम ये भी जानते हैं कि ये कोरी बकवास है।

औसत आदमी की ज़िंदगी लगभग उसके पैर पर खड़े होने के पहले ही दिन निर्धारित हो जाती है। उसी दिन आप ख़ुद को समझा लेते हैं कि सारी भाग-दौड़ के बाद जो पहली चीज़ मिली वही मेरा लक्ष्य रहा होगा। लक्ष्य बनाया ही नहीं, जो मिला उसे मान लिया।

उस दिन, जैसा कि पंजाब के बेहतरीन कवि पाश कहते हैं, “सबसे ख़तरनाक होता है, सपनों का मर जाना”, आपके सपनों की आप भ्रूण-हत्या कर देतें हैं। ये आप ख़ुद करते हैं। आईएएस नहीं मिला तो रेलवे की नौकरी कर रहे हैं, बैंक नहीं मिला तो पुलिस में चले गए।

लेकिन फिर आपको अपने पास के आदमी से न ही चिढ़ने का, ना ही जलने का अधिकार है जो अच्छी कमाई करता है, साल में दो बार रोम और अफ़्रीकन सफ़ारी पर जाता है, जिसके कमरे में कुत्ते के रहने का घर है।

कुछ लोग सपनों की ओर भागते हैं और कुछ छलाँग लगाकर उसे पकड़ लेते हैं। औसत आदमी एक दिन थक जाता है। उसे अपनी दुनिया सिमटी हुई सी ही अच्छी लगने लगती है। उसका हाल सिसिफस जैसा हो जाता है जिसे देवताओं का श्राप था कि रोज़ एक चट्टान उसे पर्वत के शिखर पर ले जाना है, अगर सूर्यास्त से पहले वो पहुँच गया तो उसे इस सज़ा से मुक्ति मिल जाएगी, पर ऐसा कभी हुआ नहीं। इस पर अल्बेयर कमू लिखते हैं कि क्या पता सिसिफस ने एक वक़्त के बाद सूर्यास्त से पहले पहुँचने की सोच को नकार दिया हो? क्या पता उसे पत्थर लुढ़काकर ऊपर ले जाने में मज़ा आने लगा हो?

ख़ुद को सिसिफस या प्रोमीथियस बनाने से बचें। प्रोमीथियस को भी देवताओं ने ऐसी ही सज़ा दी थी कि दिन भर वो एक पत्थर से बँधा रहेगा और चील-कौए उसके लीवर को खोद खोद कर खाएँगें जो कि बड़ा ही दुःखदायक होता है और रात होने पर उसका लीवर फिर से बढ़ कर सुबह तक ठीक हो जाएगा। हर दिन यही होगा। इसे अंग्रेज़ी में ‘इटरनल पेन’ कहा गया है।

औसत आदमी इसी दर्द को जीने लगता है और फिर जैसा कि ग़ालिब कहते हैं, “दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना”, वो इसी को प्रारब्ध समझ कर जीते हुए मर जाता है।

मेरे हिसाब से परेशानियाँ, परिस्थितियाँ हमेशा ही विपरीत होती हैं। जिस लड़की को पेट में ही मारने की योजना बनती है, वो पैदा होती है, फिर उसे पढ़ाने से मना किया जाता है, वो पढ़ती है, वो बहुत अच्छा पढ़ती है, मेहनत करती है और फिर ज़िंदगी के तमाम मुकामात छूती है जिसे सोचना भी हास्यास्पद माना जाता है उस समाज में।

इसीलिए औसत बनना बंद करो। अभी एक तिहाई ज़िंदगी ही कटी है। पूरा भविष्य आगे है। ऐसा कुछ भी नहीं जो कोई पा नहीं सकता। परिस्थितियाँ विपरीत होंगी पर धैर्य रखो, देर-सबेर ही सही पर जो चाहा है वो मिलना ही है।

सबके सपने चार पहिए की गाड़ी की नहीं होती पर कोई मर्सिडीज़ चलाकर भी ख़ुश नहीं है। मेरा तात्पर्य सपने को ख़ुशी से जोड़ने की है। प्रश्न है कि आप कलेक्टर हो गए पर क्या आप वही बनना चाहते थे या आप साईकिल उठाकर पूरी दुनिया घूमकर सभ्यताओं को समझना चाहते थे। सोचने का समय अभी है, जीने का कल और रोने का पूरी जिंदगी, चुन लीजिए।

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