कमरे के भीतर

महीनों से वो घर से बाहर नहीं निकलता। न कहीं जाता है, न कहीं से आता है। किसी ने उसे कुछ करते हुए नहीं देखा। सिर्फ़ जगता है, बेसिन तक जाता है, चेहरा धोता है, बाथरूम से निकलता है, ब्रश करता है, कुछ खाता है और फिर उसी कमरे में घुस जाता है जहाँ से निकला था।

किसी ने उसे बालकनी में देर तक नहीं देखा। कभी फ़ोन करने तो कभी लाईट जाने पर बाहर आता है पर जल्दी ही चला जाता है। आख़िर करता क्या है?

कमरे में बंद, काफ़्का की किताब पढ़ता है और ख़ुश होता है कि वाह, क्या कहानी थी। कहानी तो वो ख़ुद भी अच्छी लिखता है। प्रेम उसका पसंदीदा विषय है और साथ ही अंतर्मन से चल रहे द्वंद्व की बातें भी वो बख़ूबी लिखता है।

छोटा सा कमरा है। ज़मीन पर सोता है वो। तरह तरह के संगीत में रूचि है। भीमसेन जोशी, नुसरत, लेनन, बेगम अख़्तर, किशोर, लता, निर्वाणा, शारदा सिन्हा… तमाम तरह के संगीत सुनता है। पड़ोसी समझ नहीं पाते कि उसे पसंद क्या है।

कभी पूरी आवाज़ में हनी सिंह तो कभी मेंहदी हसन… लोगों को लगता है कि एक ही आदमी एक ही समय में इन दोनों को कैसे सुन सकता है! लेकिन वो सुनता है, वो भी एक के बाद एक।

किताबें पढ़ना बहुत पहले छोड़ दिया था जब चेतन भगत जैसे लोग बेस्ट सेलर हो गए थे। कहता है घिन आती है कुछ लेखकों की बातें सुनकर। न कल्पना है, ना ही अच्छे शब्द या विचार और एक पूरी पीढ़ी इनके पीछे साहित्यकार समझकर भाग रही है। इस बात से बहुत चिढ़ है।

फिर बहुत दिन के बाद उसने फ़्राँज़ काफ़्का को पढ़ा और फिर लगा कि मानवीय संवेदनाओं और खोखलेपन की कितनी समझ थी उसे। दोस्तोव्स्की और तुर्गनेव की तरह। अरसे बाद उसे पढ़कर ख़ुशी हुई थी। आजकल तो बस कचरा ही लिख रहे हैं।

पाठकों के लिए कोई नहीं लिख रहा, सब ख़रीदारों के लिए लिखते हैं। वो कहता है कि आप शायद पाठक और ख़रीदार में अंतर समझ ना पाएँगे। पाठक को साहित्य चाहिए और ख़रीदार या उपभोक्ता को किताब। किताब वैसे ही है जैसे आपका शैंपू। उसे हैड एण्ड सोल्डर्स का हरा वाला पैक पसंद है लेकिन साहित्य शैंपू नहीं है।

लेकिन कितने लोग काफ़्का को समझेंगे? काफ़्का की बातों से घर नहीं चलता। सच्चाई ये है कि वो घर में बैठा हुआ है और दुनायवी नज़रिये से कुछ नहीं कर रहा। ये खलता ज़रूर है कि वो इतने दिनों में बहुत कुछ कर लेता लेकिन कुछ भी करने से बेहतर है कुछ समय बाद अच्छा ही कुछ करें। बाद में पछताने से क्या फ़ायदा!

वो खीझता है। उसकी दोस्त जादब कहता है कि आजकल उसे ग़ुस्सा जल्दी आ जाता है जबकि जादब ही उसे गाली देता है। ख़ैर जादब को बड़े प्यार से परममित्र जादबजी कहता है इसीलिए उसकी गाली को टाल देता है। हाँ पूछता ज़रूर है कि गाली क्यों दी। और जादब हमेशा कह देता है, “ये क्या कोई गाली है, ये तो प्रेम से कहता हूँ।”

जादब जी के अनुसार उसकी जल्दी खीझने वाली प्रकृति का कारण उसका महीनों का निठल्लापन है। उसे बाहर निकलना चाहिए। कोई जाॅब ही कर ले। कहने को इतना टेलेंट है पर जाॅब नहीं कर रहा। कुछ ज़िद है। देखते हैं कब तक ज़िद टूटती है।

जादब से सारी बातें करता है। जादब बीयर पीता है और शांति से उसकी बातें सुनता है। कितना समझता है वो जादब जाने पर सुनता है और मन लायक बातें करता है।

कभी कभी सोचता है कि कोई भी जाॅब कर ले। लेकिन कोई भी जाॅब करेगा तो फिर किसी दिन बाॅस को गाली देते हुए निकल लेगा या बाॅस निकाल देगा। हलाँकि आज तक किसी ने उसके काम में कमी नहीं बताई। अकेला बहुत कुछ करता है और बहुत अच्छे से करता है पर नालायकों से एलर्जी है और मुँह पर बाॅस को नालायक कहना कोई अच्छी बात नहीं है ना! है कि नहीं, आप बताईए?

कोई कहता है कि उसके एटीट्यूड में प्राब्लम है, कोई कहता है कि सुंदर कांड पढ़ें तो शांति मिलेगी और मनचाहा फल भी। वो कहता है कि जब इतने महीनों से भगवान की तरफ़ नहीं गया तो बुरे समय में तो अपने आप से समझौता करना हो जाएगा। जब उसे मनचाहा मिलेगा तो भले भगवान के पास जाएगा। वैसे भी भगवान उसके समझ में नहीं आया कभी। ना ही उसने कभी कोशिश की। सीधी फिलाॅसफी है लाईफ़ की, “भला न कर सको ते कम से कम किसी का बुरा ना करो।”

उसका कमरा भी कमाल ही है। इंटरनेट है, संगीत है, किताबें हैं और क्या चाहिए। कोशिशें जारी हैं और लगता है देर से ही सही पर जल्दी ही कुछ बदलाव आएगा।

वो कमरे से बाहर निकलेगा, जल्द ही निकलेगा।

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