‘मेरे युग का मुहावरा है, फ़र्क़ नहीं पड़ता’

तुमने जहाँ लिखा है प्यार
वहाँ सड़क लिख दो
फ़र्क़ नहीं पड़ता
मेरे युग का मुहावरा है
फ़र्क़ नहीं पड़ता

~केदारनाथ सिंह

केदारनाथ सिंह ने अपने समय में ये लिखा था और उसके बाद से तो प्यार की जगह सड़क, नाली, टट्टी, पेशावघर, काँजीहौस… कुछ भी लिख दो, फ़र्क़ नहीं पड़ता जी!

और प्यार का अगर थोड़ा व्यापक अर्थ लें कि प्राणीमात्र से प्यार, तो फिर स्थिति और भी भयावह है। समय नहीं है सोचने का क्योंकि फ़र्क़ नहीं पड़ता।

बदायूँ में इसी प्यार के सड़क पर रौंद दिये गए दो जीवन, और रौंद दिए जाते हैं लगभग रोज़ ही एसे प्यार करने वाले अलग अलग जगहों पर।

हमें क्या? वैसे भी हम बहुत ज़्यादा कर नहीं सकते, हाँ महसूस कर सकते हैं जिसमें कोताही नहीं होनी चाहिए। लेकिन ये बातें आपके गणित की किताब की त्रिकोणमिति नहीं है कि बीस नंबर का नहीं पढ़ेंगे तो भी पास हो जाएँगे।

गणित और जीवन में यही फ़र्क़ है और हमें, आपको, हर इंसान को फ़र्क़ तो पड़ना चाहिए। इराक़ के हालात पर फ़र्क़ पड़ना चाहिए, ट्विन टावर पर प्लेन हमले पर फ़र्क़ पड़ना चाहिए और घटते हुए लिंगानुपात पर भी फ़र्क़ पड़ना चाहिए।

अपने युग के इस मुहावरे को बदलने की ज़रूरत है, फ़र्क़ तो पड़ना चाहिये अगर कोई प्यार की जगह सड़क लिख रहा हो तो।

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One thought on “‘मेरे युग का मुहावरा है, फ़र्क़ नहीं पड़ता’

  1. indeed we stand stubborn in our shoes…
    i wonder if we have lost feeling for others, Is the fact that now a days a son who leaves his 85 year old mother to live alone in a stranded house evident of this idiom ?

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