मानवाधिकार गए तेल लेने: बड़े राष्ट्र

ख़ेमों में कूदना बाक़ी है। यूक्रेन में मलेशिया के विमान को मार गिराया जाता है। हमास के द्वारा तीन किशोरों की कथित हत्या का बदला चालीस बच्चे और दो सौ से अधिक लोगों को मारकर पूरा किया जा रहा है। लेबनान, सीरिया, लीबीया महीनों से गृहयुद्ध जैसी स्थिति झेल रहा है। पाकिस्तान का साप्ताहिक ‘विस्फोट में मौत’ की ख़बर आँख मूँदकर सही माननी पड़ रही है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान अपनी पहुँच और शक्ति दोनों का प्रदर्शन कर रहा है। ईराक़ में ख़लीफ़ा बनाने की चाहत में दर्जनों लोग रोज़ मारे जा रहे हैं। उत्तर कोरिया क्या कर रहा है किसी को पता नहीं, क्या कर बैठेगा ये भी किसी को पता नहीं।

स्थिति बहुत भयावह है। वैसे हमारे देश के लिए बलात्कार, आगज़नी, दहेज हत्या, आम हत्याएँ, अपहरण इत्यादि को सामान्य मान लिया गया है और गाहे-बगाहे हम, आप, और तमाम जनता रोष प्रकट कर ही देती है। कम से कम इतना तो हम कर ही सकते हैं क्योंकि इससे ज़्यादा, सही मायनों में, हमारे हाथ में नहीं है।

कश्मीर, उत्तर पूर्व के राज्यों में होते नरसंहार (हाँ नरसंहार ही कहेंगे, चाहे सरकार करें या उग्रवादी), नक्सलियों का शिकार बनते सरकारी अफ़सर और आम जनता, और जो बच गए तो अपने अपने प्रदेश के दादाओं, बाहुबलियों और गुंडों के हत्थे चढ़ ही जाना है।

हम सरकार चुन देते हैं लोकतांत्रिक तरीक़े से। इराक, लीबीया, सीरिया इत्यादि में भी ऐसी ही सरकारें हैं। इसका मतलब ये नहीं कि मैं भारतीय सरकार को वैसा ही मान रहा हूँ। हमारी आंतरिक और आतंकी दोनों समस्याएँ हैं पर, चाहे सांत्वना ही क्यों ना हो, यहाँ गृहयुद्ध की स्थिति नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र संघ मुँहठोकवा जैसा टुकुर टुकुर ताक रहा है। कभी कभार एक दो निंदनीय हरकत होने के बयानात दे देता है। पर जिस संस्था में किसी को वीटो पावर हो वहाँ लोकतांत्रिक विचारों की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। जब तक अमेरिका कुछ नहीं सोचता, संघ कुछ नहीं बोलता।

नाटो, शांति सेना, मानवाधिकार की बातें इत्यादि जो अमरीकन पुराणों का आदिवाक्य रहा है, आजकल वो श्लोक भी नदारद हैं। हँसी तो तब आई जब अमेरिका ने, ईराक़ को तबाह कर देने के बाद, ईराक़ की माँग पर कि हवाई हमले कर के आतंकियों से निपटने में मदद करो, कहा कि उनके पास तीन सौ ‘सलाहकार’ हैं जो आईएसईएएस से निपटने में सलाह देगा।

भारत ने ये कहते हुए कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी कि ईजरायल और फ़िलिस्तीन दोनों हमारे मित्र देश हैं! ये क्या बात हुई! आज ही पढ़ा कि एक पति-पत्नी को चार साल से बच्चा नहीं हो रहा था, किसी तरह एक बच्चा हुआ पिछले साल और आज वो ईजराईली हमले में मारा गया।

क्या ये सारे बड़े देश मूक दर्शक बने रहेंगे या तेल ना होने की स्थिति में भी मानवाधिकारों का हनन अमेरिका को दिखेगा? भारत क्या इस तरह की बेहूदी दलील देगा या सही में खुलकर भर्त्सना करेगा?

फ़िलिस्तीन की लड़ाई मुसलमानों की नहीं है। लड़ाई एक देश की है जो आज भी आज़ाद होना चाह रहा है। सबको सर उठा कर जीने और शांति से मरने का हक़ है। अगर हर देश ऐसे ही अपने हाल पर छोड़ दिया जाए तो काहे का संयुक्त राष्ट्र संघ? इसकी हालत भी लीग आॅफ नेशन्स जैसी हो जाएगी।

संघ की हालत गाँव के उस बूढ़े जैसी है जो कहता है कि गाय खुल गई, कोई बाँध दो लेकिन छोटे बच्चे उसकी धोती खींच कर ये कहते हुए भाग जाते हैं कि बाबा अपना काम करो, चैन से रहो।

ये कैसी मानवता है कि लोग फ़िलिस्तीन पर होते राॅकेटबारी को पहाड़ों पर फोल्डिंग लगाकर, पाॅपकाॅर्न खाते हुए देखते हैं! ये कैसी मानवता है कि पाकिस्तान में हम फटने पर हमें ख़ुशी होती है!

पहले मानवाधिकारों के लिए अमेरिका तेल लाने जाता रहा, और आजकल मानवाधिकार ही उसके लिए तेल लेने गए!

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