भिखारी ठाकुर की एक रचना: कहाँ जईबऽ भईयाऽ

भोजपुरी के महान साहित्यकार भिखारी ठाकुर, जो बिरहा, विलाप और नाटक लिखते थे, उनकी एक रचना रख रहा हूँ:

कहाँ जइबऽ भइया? लगावऽ पार नइया,
तूँ मोर दुख देखि ल नेतर से बटोहिया।
सुनऽ हो गोसइयाँ, परत बानी पइयाँ,
रचि-रचि कहिहऽ बिपतियाँ बटोहिया।
छोड़ि कर घरवा में, बीच महधारवा में,
पियवा बहरवा में गइलन बटोहिया।
जइबऽ तूँ ओही देस, देखि लऽ नीके कलेस,
ईहे सब हलिया सुनइहऽ बटोहिया।
नइहर ईयवा, तेयागि देलन पियवा,
असमन जनिहऽ जे धियवा बटोहिया।
कइसे के कहीं हम, नइखे धरात दम,
सरिसो फुलात बाटै आँखि मे बटोहिया।
कहत ‘भिखारी’ नीके मन में बिचारि देखऽ,
चतुर से बहुत का कही हो बटोहिया।

भावार्थ:

नायिका, जिसका पति बाहर कमाने गया है और बहुत दिनों से आया नहीं है, वो एक बटोही (यात्री) से पूछती है कि वो किस तरफ़ जा रहा है। पता जान लेने पर उससे गुज़ारिश करती है कि वही उसके दुःखों की नैय्या पार लगा सकता है। कहती है बटोही से कि वो ठीक से, नज़दीक़ से उसकी परिस्थिति देख ले कि प्रियतम के बिछोह में वो कैसी हो गई है।

बटोही को गोसाँई, यानि भगवान, कहते हुए कहती है कि वो उसके पैर पड़ती है कि उसके पति तक उसकी बात सारे दर्द के साथ भाव में डूबकर कहे। फिर वो बताती है कि किस तरह से उसके पिया उसे घर में छोड़कर, जहाँ सब कुछ नया है, सब अनजान और अजनबी हैं, वहाँ से बाहर चला गया कमाने के लिए।

आगे कहती है बटोही से कि वो तो उसी देस को जा रहा है जहाँ उसका पति है, इसीलिए ठीक से उसके दुःख को देख ले और यही सब, जैसे देखा वैसे ही सुनाए उसके पति को। फिर एक बेटी के दुःख की तरफ़ इशारा करकी है कि नैहर, माँ-बाप सब तो शादी के बाद बेटी के लिए पराए हो जाते हैं, आसमान जानता है एक बेटी के दर्द को।

अपनी स्थिति बताते हुए नायिका कह रही है कि किस तरह से वो अपनी व्यथा कहे जो बटोही को उसकी पूरी बात सही सही महसूस हो। कहती है कि अब साँस लेने तक में तकलीफ़ होती है और आँखों की हालत रो रोकर ऐसी हो गई है मानो सरसों आँख में डल गया हो।

अंत में सारी बात कहने के बाद वो बटोही से कहती है कि उसने जो भी कहा सिर्फ़ उस पर ना जाए बटोही और अपनी बुद्धि और विवेक से विचारकर, जैसा सही लगे, उसके पति तक उसकी बात चतुराई से पहुँचाए।


प्रसंग:

ये कविता, बिरहा/बिलाप भी कहते हैं, बिहार के सामाजिक स्थिति को दर्शाती है जब लोग घर छोड़कर कमाने के लिए बाहर के राज्यों में चले जाते थे। लड़की शादी के बाद ससुराल आ जाती थी और ताने, उलाहना, जली-कटी सुनती रहती थीं। अगर घर का माहौल ठीक भी हो तो फिर पति के प्रेम से वंचित रहती थी।

भिखारी ठाकुर ने काफ़ी लिखा है इस पर। उनका लिखा हुआ नाटक ‘बिदेसिया’ उत्तर भारत में सर्वाधिक मंचित होने वाले नाटकों में से एक है। उसमें भी नायिका ऐसी ही है, कहती है:

सुकबा उगल तऽ पियवा भागल हो राम

यानि शुक्र ग्रह, जो सुबह में सबसे पहले दिखता है, के उगते ही उसका पति घर छोड़कर चला गया…

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