ज़िंदगी के तमाम सवाल और आत्महत्या

हास्य कलाकार महज़ एक कलाकार नहीं होता। वो समाज पर अपने ग़ुस्से को हास्य के रूप में प्रस्तुत करता है और उसे चलायमान रखता है। जब भी ऐसा कलाकार हमें छोड़कर जाता है तो सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं, बल्कि सच में, समाज का एक हिस्सा विलुप्त हो जाता है।

सच है कि नए लोग आते हैं, समाज चलता रहता है। लेकिन ये भी सच है कि बर्फ़ के उड़ते हर एक फाहे की तरह, हर कलाकार अपने आप में विशिष्ट और अनोखा होता है।

कल महान हास्य कलाकार और फ़िल्म अभिनेता राॅबिन विलियम्स ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। क्यों की, इसके कई कारण हो सकते हैं। आत्महत्या कायरतापूर्ण बात नहीं है। अल्बेयर कमू कहता है कि आत्महत्या एक समस्या नहीं है, ना ही ये कोई प्रश्न है। आदमी आत्महत्या तब करता है जब उसके पास ज़िंदगी के कुछ सवालों का हल नहीं मिलता।

आत्महत्या का सवाल दर्शन का है, फिलाॅसोफिकल है। आदमी के ज़िंदगी में इतनी विविधताएँ हैं, कई बार ये इतनी बेतुकी, विवेकहीन लगती है कि आदमी के इस सवाल का जवाब कि ‘क्या जिंदगी जीना सही रास्ता है?’ नहीं में मिलता है और फिर इस तरह रोज़ रोज़ की बेतुकी चीज़ों के “प्राकृतिक जवाब” के रूप में वो आत्महत्या कर लेता है।

दुनिया के निन्यानवे प्रतिशत लोग, शायद और अधिक, आत्महत्या को अप्राकृतिक मानते हैं। इसे कायरतापूर्ण हरकत कहते हैं। पर इन सब में वो ये भूल जाते हैं कि हम अपनी ऊँगली में खरोंच लगने तक पर दर्द महसूस करते हैं। अगर मैं कहूँ कि अपनी ऊँगली को चाक़ू से थोड़ा सा काट लो तो कोई नहीं काटेगा। फिर सोचिए कि अपनी जान ले लेना कितनी हिम्मत की बात होगी।

सोचिए उस वक़्त को जब कोई ज़हर की शीशी हाथ में लेता है, जब कोई कैरोसीन तेल उड़ेल कर हाथ में माचिस की तीली पकड़े रहता है, जब कोई नये ब्लेड को कलाई पर रखकर नस खोजता है… सोचिए उसके बारे में जिसके पेट में बच्चा है और वो पुल पर आने वाली रेलगाड़ी का इंतज़ार करती है…

ये कायरों का काम नहीं है। हो सकता है आप में से कोई भी मेरी बात से सहमत ना हो। आप एक लाईन की दलील देंगे की वो कायर होतें हैं, हमें ज़िंदगी से लड़ना चाहिए। क्यों लड़ें? आपके पास इस सवाल का जवाब है कि हीरोशिमा में मरने वालों का भगवान क्या कर रहा था? या इस सवाल का कि मैं दसवीं में फ़ेल होकर दोबारा पूरे समाज के सवालों को देखता रहूँगा जबकि मैं जानता हूँ कि मैंने पढ़ाई की और जितना हो सका लिखा?

ज़िंदगी में बहुत चीज़ों को हम सार्वभौम सत्य मान लेते हैं। जैसे कि सबका पढ़ना। सब लोग क्यों पढ़ेंगे? सिर्फ़ इसलिए कि बाक़ी सब पढ़ रहे हैं!

उसी तरह जीना भी है। सब लोग क्यों ज़िंदा रहें? मुझे जीना पसंद नहीं है, मुझे साईंस पसंद नहीं, मुझे कठिनाई पसंद नहीं और इसके लिए कायर, निकृष्ट कहलाना भी पसंद नहीं।

क्योंकि मानवों ने जीवन को एक तरह से जीना, एक ढर्रे में डालना और एक लीक पर चलना मान लिया है। ऐसा नहीं करना है, ऐसा करने से ऐसा होगा, नौकरी करना अच्छी बात है, टाॅपर बनना सही है, कुछ नहीं करना आलस्य है… ये कौन डिसाईड करता है कि कुछ नहीं करना बुरी बात है… मैं ज़िंदा क्यों रहूँ जब चीज़ें मेरे समझ के बाहर हैं? जिसे हम नहीं समझ पाते उसे पागल कह देते हैं। आप कौन होते हैं ये कहने वाले? ये कौन बताता है कि आपका पागल बताने वाला विज्ञान सही है?

मैं आत्महत्या करने नहीं कर रहा लेकिन जो करते हैं मैं उन्हें ग़लत नहीं मानता। उसकी ज़िंदगी है, उसकी आशाएँ हैं, इच्छाएँ हैं, सवाल हैं। और वो सिर्फ़ खुद के लिए ज़िम्मेदार है। जानता हूँ अतिवादी कथन है पर मैं बहुत ज़ोर से इसमें विश्वास करता हूँ।

सच तो ये है कि हमारे तमाम भगवान, तमाम दलीलें की कोई सत्ता हमें देख रही है, का कोई मतलब नहीं है। अगर भला करने वालों का भला होता और बुरा करने वालों का बुरा तो समाज में कोई परेशानी नहीं होती।

ज़िंदगी विचित्र है। आपके, हमारे सवालों का जवाब नहीं है। आशा का दामन भी एकबारगी छूट जाता है जब आपको जवाब नहीं मिलता। सकारात्मक होना महज़ एक शब्द है क्योंकि सकारात्मकता मेरे सवालों का जवाब नहीं देती है।

आदमी को आदमी मार देता है, जानवर मार देता है, गोली मार देती है, चाकू मार देती है, बीमारी मार देती है, दुर्घटना मार देती है… मरने के कई तरीक़े हैं। अगर ये सारे तरीक़े ग़लत नहीं हैं तो फिर आत्महत्या ग़लत कैसे है? आत्महत्या तो आदमी नापतौल कर, सोच समझकर, जानकर कि ज़हर की कितनी मात्रा, कौन सी नस, कितनी ऊँचाई, कौन सी दवाई का कितना ओवरडोज़, उसकी जान ले लेगा, तब अपनी जान लेता है।

ये हारना नहीं है, ये समझना है कि अब यहाँ कुछ जीने लायक बचा नहीं, चलने का समय हो गया। ये वैसा ही है जैसे आप को कोई ज़बरदस्ती वैसा संगीत सुना रहा है जो आपको पसंद नहीं, तो आप उठकर चले जाते हैं या नया संगीत सुनते हैं। ज़िंदगी एक ही है, नई मिलती या नहीं पता नहीं।

तमाम भगवान यहाँ कन्फ्यूज्ड हैं। अल्लाह कहता है कि क़ब्र में क़यामत तक दबे रहो, दूसरा जन्म नहीं है। विष्णु कहता है चौरासी लाख बार जन्म होगा जब तक मोक्ष नहीं मिलता… जरथ्रुस्ट्र कुछ कहता है, गाॅड द फ़ादर कुछ और कहता है!

फिर रास्ता क्या है? रास्ता आप की इच्छा है कि आप वही संगीत सुनते रहने चाहते हैं या उठकर कहीं और जाना चाहते हैं… कई बार जब जवाब नहीं मिलते, आप, हम जी रहे हैं क्योंकि हमारे पास अभी तक जवाब हैं। बहुतों के पास जवाब नहीं होते और आपके जवाब उनके लिए ज़रूरी नहीं कि सही हों।

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