सारे जहाँ से अच्छा… (On Indian Independence Day)

मैं भी हो जाता हूँ, आप भी हो जाते हैं और कई बार तो फ़ैशन में पूरा का पूरा युवा वर्ग हो जाता है: राष्ट्रीय पर्वों के दिन सिनिकल यानि दोषदर्शी, निंदक… कुछ लोग कविताएँ ढूँढ लाते हैं धूमिल की, दुष्यंत की, या अपनी ही लिखी और ऐसी भर्त्सना करते हैं कि लगता ही नहीं की अल्लामा इक़बाल ने ये हमारे ही लिए लिखा था।

मैंने शुरुआत ही ख़ुद से की है। वैसे मैं आदमी तो ग़लत नहीं हूँ पर कई बार दोषान्वेशातिरेक में और हताशावश इन दिनों पर जमकर वैसे शब्द लिखता हूँ जो बाद में अभद्र और अनावश्यक प्रतीत होते हैं।

दिनकर का एक लेख पढ़ा था नवीं कक्षा में, ‘हिम्मत और ज़िंदगी’, जिसमें वो लिखते हैं कि पानी में जो अमृत वाला तत्व है उसको वही महसूस कर सकता है जो लंबे समय से रेगिस्तान की गर्मी झेल कर आया हो। तात्पर्य यह है कि ये जो गुलिस्ताँ है, हम जिसकी बुलबुलें हैं, इसकी महक और संगीत को सराहने की कोशिश करनी चाहिए।

हमने आज़ादी ख़ैरात में पायी है और इसीलिए इसकी इज़्ज़त नहीं करते। ये सड़क पर थूकना, कचड़ा फैलाना, गाड़ी बेहूदों की तरह चलाना, जातिविशेष, लिंगविशेष पर टिप्पणी करना इत्यादि सब उसी खैराती आज़ादी की नाजायज़ औलादें हैं जिसे हम, आप सब पाल रहें हैं।

वो पीढ़ी चली गई जिसने बम फेंका था और सिर्फ़ इसीलिए वहाँ से नहीं भागी क्योंकि उनके फाँसी चढ़ने से पूरा हिंदोस्ताँ उबल जाता। वो पीढ़ी चली गई जिसका एक बेटा अंतिम गोली ख़ुद को मार लेता है ताकि अंग्रेज़ की गोली उसे अपवित्र न कर सके। वो पीढ़ी भी चली गई जिसमें उपवास, अनशन, अहिंसा की बातों से मानवता के इतिहास को बदल दिया।

अब कोई बचा नहीं है। हम बचे हैं जिसके हाथ में इतिहास के कुछ पन्ने हैं, उस मरहूम रूह की डायरी है जिसने अंतिम वक़्त पर ईश्वर की पनाह लेने को कायरता क़रार देकर मना कर दिया था, उसके नाम का ख़ूनी हस्ताक्षर है जिसने कोहिमा जीता था।

वो धरोहर, वो डायरी, वो हस्ताक्षर, वो चरखा, अजायबघर में देखकर सेल्फी लेने या परीक्षाओं में रट कर पास होने के लिए नहीं है। वो सीखने के लिए है, जीने के लिए है कि ऐसे भी लोग थे जिन्होंने हमारे लिए ये सब किया।

आज़ादी का मतलब हमें तब तक समझ में नहीं आएगा जब हमारा मुल्क इराक़ या पाकिस्तान हो जाएगा जहाँ बम फटने से मौत वैसी ख़बर होती है जो रोज़ होती है पर कोई पढ़ता नहीं क्योंकि रोज़ का यही हाल है। आज़ादी का मतलब शायद तब समझ में आएगा जब हमारी बहन को उसके पेट के बच्चे सहित मौत की सज़ा इसीलिए सुना दी जाए क्योंकि वो मुस्लिम बहुल देश में ईसाई है जिसका पति मुस्लिम है!

कहते हैं समझदार इन्सान के पास पूरी ज़िंदगी नहीं होती ख़ुद ग़लती करके सीखने की। वो दूसरों को देखकर सीखता है। हमें इन ख़ास मौक़ों पर, नाम का ही सही (बेहतर हो कि दिल से), देशभक्ति तो दिखानी चाहिए। तुम झंडे मत लगाओ घरों पर, वाॅल पर, प्रोफ़ाईल पिक में, लेकिन जिसने ऐसा किया हो उसकी भावना पर संदेह मत जताओ। और ऐसा नहीं है कि हम बाक़ी दिन भूल जाते हैं पर ख़ास दिनों पर थोड़ा ख़ास ध्यान तो देना भी चाहिए।

हम रोतें है, गलियाते हैं टूटी सड़क और लेट ट्रेन पर। हम रोतें है प्याज़ के महँगे होने पर। ख़ुद दंगे करते हैं और ख़ुद सवाल उठाते हैं। हमारा रोना नाजायज़ नहीं है। समाज को, देश को रास्ते पर रखने के लिए ये ज़रूरी है कि हमें हमारा हक़ मिलता रहे पर सही दिनों पर गलत बातें मत उठाईए।

थोड़ा सोचो धर्मनिरपेक्ष होकर, लिंग निरपेक्ष होकर, जाति निरपेक्ष होकर अपने ख़ूबसूरत संविधान की पंक्तियों को, तो वाक़ई लगेगा: सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्ताँ हमारा!

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