मंगलयान: साढ़े ६ रूपया प्रति किलोमीटर, नो नाईट चार्ज एटसेटरा

लाल ग्रह पर पहुँच गया जी मंगलयान या मॉम या मार्स ऑरबिटर मिशन। हमें तो मंगलयान बढिया लगता है सो वही कहेंगे। अंग्रेज़ी आती नहीं, आती भी तो एक्सेन्टेड नहीं बोल पाते… मतलब नहीं आती है।

पहले जे है से मंगलयान को पहुँचाने के लिए ईसरो वाले दिल्ली आए थे। सबसे सस्ता साधन डीटीसी का बस पड़ता, लेकिन बहुत बड़ा था इसीलिए ऑटो वालों के पास गए। लेकिन आपको तो पता ही है ऑटो वालों का! देश का काम हो फिर भी इनका मीटर नहीं चलेगा।

“सर मीटर ख़राब है और नोएडा बॉर्डर पर टोल टैक्स देना पड़ेगा। नहीं जाएँगें। नाईट चार्ज भी लगता है और उधर से सवारी भी नहीं मिलेगी। आप दूसरा कर लो कोई।”

“अरे भाई नोएडा होके नहीं जाना है। ऊपर, स्पेस में कोई टोल-वोल का झंझट नहीं है। एक बार ये सामान डालेंगे और फिर सीधा मंगल पर। और पैसे भी तो करोड़ों में दे रहे हैं, बीच में लगभग तीन सौ दिन इंजन बंद रखना, सीएनजी भी बच जाएगी। बात को समझो यार! चलो, मीटर चालू करो।” के. राधाकृष्णन साहब ने समझाया।

“ऐ भाई! ये सामान अभी मत रखो! ये देखो आईडिया इंटरनेट तो कहता है कि मिनट मिनट में धरती और मंगल की दूरी बढ़ती रहती है! ये कौन बताएगा? बहुत झंझट है, आप दूसरा कर लो ना…” ऑटो वाला नहीं माना।

जाने का तो बिना मीटर के जा सकते थे पर एक तो सरकारी काम है और देशभक्त वैज्ञानिक ईमानदार प्रजाति होती है, और दूसरी बात कि साला सत्यमेव जयते का टंटा हो गया था। फिर तय हुआ कि अपनी ही गाड़ी से जाएँगें।

ऑटो वाले प्लान के फ़ेल होने के बावजूद, वैज्ञानिक लोगों ने पंद्रह महीने में बना लिया सबकुछ और केलकुलेट किया कि यहाँ से मंगल तक पहँचने का कॉस्ट साढ़े चार सौ करोड़ होगा, दूरी पैंसठ करोड़ किलोमीटर। यानि की लगभग साढ़े 6 रूपये प्रति किलोमीटर।

वित्त मंत्रालय ने कहा, “अहो! अहो! ये सफल रहा तो दिल्ली की सड़कों पर मंगलयान ही चलेगा।” आपलोग नेताओं की बात का बुरा मत मानिए।

ख़ैर मंगलयान तो चौबीस सितंबर की सुबह अपने जगह पर सही सही पहुँच गया और सबको ट्वीट करके बताया, “भैया हम पहुँच गए।” वहाँ अमेरिका का क्यूरियोसिटी रोवर और मावैन भी है तो मन लगा रहेगा बेचारे का। देखिए अमेरिका का मावैन (माँ-बैन), और अपना वाला है मॉम, मतलब लेडीज़ फ़र्स्ट हो गईं हैं।

अब अगर कुछ का इंतज़ार है तो वो है मॉम की सेल्फी का। मॉम पाऊट बना के डक फ़ेस मे एक भेज दे तो मज़ा आ जाएगा डूड और हाट चिक्स लोगन को।

बाकी त जानले बात है। आप कम्यूनिस्ट हैं फिर भी ख़ुश हो लीजिए। लोग मरते ही रहेंगे, कहने वाले ग़रीब देश और फ़लाना-ढिमकाना करते रहेंगे। हर बात के लिए अलग भाव है, ख़ुश होकर दो लाईन लिखने या महसूस कर लेने से आपकी बुद्धिजीविता पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जिनका दिल मोदी के प्रधानमंत्री बनने से आज तक दुखता है उनके लिए सहानुभूति।

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