समझदारी का रोग

फिर से फ़ेसबुक से मन उचट रहा है। हमें एक बीमारी हो गई है, खुद को समझदार समझने की और अपना लिखा पढ़कर लगता है कि यहाँ पर कुछ भी लिखूँ तो एक ही उद्देश्य होता है कि मैं खुद को सबसे बड़ा विद्वान, तत्वज्ञानी, और समझदार दिखाना चाहता हूँ और बाकी लोगों को नीचा।

ये समझदारी की बीमारी बहुतों को है। सामान्य सी बात है कि जिंदगी भर कम्यूनिस्ट होने का झोला लेकर घूमने वाले, ग़रीबों की स्थिति पर कविता करने वाले अपना वसूल बेचकर, सारे विचारों को झोली भर में समेटकर एक बीस मंज़िला शीशमहल में प्रोजेक्टर पर छत्तीसगढ़ के नक्सलियों के हिमायती बनते हैं तो सुलगती है हमारी।

बाल बढ़ाकर, हवाई चप्पल और घिसा हुआ जींस पहनकर कोई कम्युनिस्ट हो सकता तो हम भी हो लेते। बाल तो हमने भी बढ़ाया है और हवाई चप्पल पहनकर ऑफिस भी गए हैं। और कम्यूनिस्ट हो गए तो आपकी कुंडलिनी जागृत हो गई, ऐसा समझिए। कमसकम दिखाईए ज़रूर।

हमें बहुत बातों से दिक़्क़त है। तुम्हारे फोटो से लेकर, तुम्हारी सड़ी हुई कविताओं और कमेंटबाजी से दिक़्क़त है। तुम्हारे क्यूट-क्यूट ‘बेबी-बाबा’ से दिक़्क़त है। इससे दिक़्क़त है कि बिना पढ़े हमारा स्टेटस लाईक कर देते हो। दिक़्क़त है तुम्हारे ‘वाह-वाह’ और ‘सर, बहुत अच्छा लिखा है’ से। दिक़्क़त है कि तुम हमारे दोस्त हो। दिक़्क़त है कि हम तुम्हारे मित्र हैं। दिक़्क़त है कि सच बोलने से पहले ही तुम्हारी फट कर हाथ में आ जाती है। और दिक़्क़त इससे भी है कि तुम्हें मर जाना चाहिए और तुम जिंदा हो। और दिक़्क़त ये भी है कि तुम एक नहीं, कई हो।

मैं एक कोढ़ हूँ। मुझे समझदारी का कोढ़ हो गया है। मैं पिकासो को समझता हूँ और पाश को भी। मैंने वोल्टेयर भी पढ़ा है और थियोंगो भी। मैं डाली का सर्रियलिज्म भी समझता हूँ और तुम्हारा यथार्थ भी। मैंने गीता भी बाँची है और बकवास शास्त्र में भी पारंगत हूँ। मैं अजनबी का मर्सों भी हूँ, हैमलेट भी। मैंने हजार ग़लतियाँ की हैं और मैं तुम्हारे हर वाक्य में गलती निकाल सकता हूँ। मैं ओथेलो भी हूँ और ईयागो भी। मैं कविताएँ बना भी सकता हूँ और तोड़ भी। मैं बिखरे हुए रंगो की सिमटी कहानी जानता हूँ और नाले में तैरते कीड़े की खूबसूरती भी।

सारी बातों को समझने के बावजूद मैं वो सब नहीं हूँ। क्योंकि कोई भी ‘वो सब’ नहीं हो सकता। मुझे नहीं बनना क्योंकि मुझमें ये समझदारी की बीमारी है जो कहती है कि मैं, मैं हूँ और तुम सब समाज के विचारों में तले हुए कीड़े। मैं तुम्हें पसंद नहीं करता क्योंकि तुम सब नीच हो और ये बात एकदम दिल से है। और तुम मुझे पसंद नहीं करते क्योंकि मैं नीच हूँ, बड़बोला हूँ और बीमार, समझदारी के दंश से।

ये ट्यूमर ख़तरनाक है। ये कैंसर मेरे अंदर फैल रहा है। इसे काटना ज़रूरी है।

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