दीवाली, पटाखे और इंटरनेटिया हिंदू झंडेबाज़

इंटरनेटिया हिंदू लोग ख़फ़ा हो गए हैं कि दीवाली पर ‘प्रदूषण’ की चर्चा होती है जबकि सालों भर गाड़ियाँ चलती है, फ्रिज से सीएफ़सी निकलता है, फैक्ट्री चलती है वग़ैरह वग़ैरह। और ये सब चाल है एक ‘हिंदू पर्व’ को दबाने का।

जब आप इन्हें ‘हिंदू’ शब्द पर घेरेंगे तो कहेंगे कि हिंदू एक ‘जियो-पॉलिटिकल आईडेंटिटी’ है। कहने का मतलब कि धर्म विशेष नहीं बल्कि हिंदू तो भारत में बसा हर कोई है। लेकिन पर्व जो है वो दूसरा ‘हिंदू’ वाला है।

दूसरा हिंदू क्या है? सनातन धर्म या हिंदू धर्म। ये भी क्लियर कर देता हूँ कि मैं हिंदू हूँ, शायद इन लोगों से ज्यादा। लेकिन मेरी सारी सूचना का श्रोत सुब्रमण्यम स्वामी का पेज नहीं है।

ख़ैर दीवाली पर आते हैं। तो ये दलील तो मैं ख़ारिज कर ही रहा हूँ और इस पर कोई तर्क नहीं करूँगा। क्योंकि किसी के बाप की मजाल नहीं कि भारत में किसी त्योहार को ‘दबा’ दे। और दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ इस्लामी शासन होने के बावजूद पूरा का पूरा देश, लुटने पिटने के बाद भी, अपनी पहचान को बचाए रखा।

तो ये दलीलें मत दो। पटाखे चलाना है चलाओ, कोई चालान नहीं हो रहा। ये एक प्रक्रिया है समाज के आगे बढ़ने की। राम के अयोध्या आने पर लोगों ने घी के दिए जलाए थे, चाईनीज़ लाईट नहीं बाँधी थी। और अगर राम का होना सत्य है तो ये भी सत्य है कि उनके ज़माने में पटाखे नहीं होते थे।

हम मनाने लगे। हमारे मनाने का तरीक़ा बदलता रहा। घी के बाद तेल के दिए आए, फिर मोमबत्तियाँ आईं, फिर रंगीन मोमबत्तियाँ आईं और अब बिजली वाले एलईडी आ गए हैं। उसी तरह एक समय पटाखा आया, फुलझरियाँ आईं, दस हजार आवाज वाली चटाई, पचास बार फटने वाले बम, और भी बहुत कुछ। कुछ इलाकों में राईफल से फ़ायर होता है।

इन सारी बातों के आने और जाने से तुम्हारे हिंदुत्व पर आक्रमण नहीं हुआ, वो नहीं दबा। लेकिन कोई आदमी कहे कि जानवरों को परेशानी होती है, धुआँ होता है तो तुम्हारा हिंदुत्व ख़तरे में आ जाता है।

तुम्हारा हिंदुत्व तुम्हारे घर के वाईफाई और बाहर के टावर से आते इंटरनेट पर निर्भर है। और काफ़ी कमज़ोर मालूम पड़ता है उन्हीं नेटवर्कों की तरह। सच यह है कि तुम ये कहकर कि ‘जानवर जाएँ भाँड़ में मैं पटाखे चलाऊँगा’ अपनी संवेदनहीनता का नमूना देने से डरते हो। तुम सोचते हो कि मेरा भाँडा फूट जाएगा। जब तुम्हें किसी की पड़ी ही नहीं तो स्वीकार क्यों नहीं करते कि तुम्हें ना ही पॉल्यूशन से कोई वास्ता है ना ही जानवरों से। लेकिन नहीं, इससे तो तुम नंगे हो जाओगे इसीलिए ये हिंदू होने का चोगा पहनना ज़रूरी है।

क्योंकि जिस तरह के फर्जी सेकुलर हिंदुओं को ताक पर रखकर बात करते हैं वैसे ही तुम्हारे जैसे फर्जी लोग जिन्हें हिंदुत्व का आभाष इंटरनेट का एक पेज दिलाता है, अपनी कमियों को ढकने के लिए झूठ बोलते हैं।

मुझे इस बात को स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं कि मुझे जानवर पसंद नहीं या मुझे बिल्लियाँ पसंद है या मेरा फ़ेवरेट रंग पिंक है। लेकिन ये हिंदुत्व को बचाने का झंडा जो तुम उठा रहे हो, उससे बस अपना नंगापन ढक रहे हो।

पटाखे चलाओ, घी के दिए जलाओ, त्योहार जैसे मनाना है मनाओ लेकिन झूठ बोलकर, हिंदुओं के प्रति नफ़रत मत पैदा करवाओ। इंटरनेट पर बहुत कैंपेन चलते हैं, शाकाहारी बन जाओ, ऑर्गन डोनेट कर दो, बच्चे को खोजने में मदद करो, दिल्ली को साफ़ बनाओ… क्या हम इन सबको मानते हैं? नहीं, क्योंकि हम वही मानेंगे जो हमारे लिए सुविधाजनक है। हमें कोई ढकेल नहीं रहा, और ना ही ना मानने से मैं बुरा हो जाता हूँ।

पहले हिंदू बन जाओ फिर झंडा भी उठाना उसे बचाने का। आजतक हिंदुओं को अपना धर्म बचाने की ज़रूरत नहीं पड़ी है और ना आगे पड़ेगी। और कम से कम तुम्हारी झंडेबाजी से तो नहीं ही बचेगी। आप अपनी नकारात्मक भावनाएँ दिए में डालकर जला लीजिए। पटाखे भी चलाईए, कोई रोक नहीं रहा। बस समझा रहा है कि समाज बदलता रहता है और त्योहारों के मनाने का तरीक़ा भी। मैं दावा कर रहा हूँ कि झंडाधारी जनता के घरों में ज़रूर ही कुम्हार के बने मिट्टी के दियों में गाय का शुद्ध घी डालकर रोशनी की जाती होगी। ये सटायर था, लेकिन तुम पटाखे फोड़ो।

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