दोस्ती और विचारधारा

आजकल आदमी इतना संकीर्ण हो गया है कि अपने से अलग विचारधारा वाले का सम्मान तो छोड़िए, उसे अछूत सदृश मानता है। कुछ समय पहले तक मैं भी ऐसा करता था। वो केजरीवाल सपोर्टर है तो मुझे घिन आती थी उससे। जबकि उसकी बातों से आनी चाहिए।

होना ये चाहिए कि मुझे तुम पसंद हो, या नापसंद नहीं हो (दोनों बातें अलग अलग हैं) पर तुम्हारे विचार उसका कारण नहीं हैं। मेरे कई दोस्त हैं जो मोदी के धुर-विरोधी हैं और कई अंधभक्त, और कई बीच में। लेकिन वो शायरी अच्छा करते हैं, वो गीत अच्छे सुनते हैं और जब मैं परेशान होता हूँ तो मेरा ढाढ़स वही बँधाते हैं।

फेसबुक और इंटरनेट के युग में आदमी के इन्टोलेरेंस का स्तर और बढ़ गया है। मैं हमेशा एक लाईन कहता हूँ कि इंटरनेट पर सबको उसका सत्य मिल जाता है। राम के होने के सौ तर्क हैं और ना होने के सौ अलग। ईसा भारत आया था इस पर सौ आर्टिकल हैं तो नहीं आया था उस पर सौ अलग रिसर्च! केजरीवाल के यू टर्न का भी वीडियो आपको विश्वसनीय लगेगा, मोदी के यू टर्न का भी और काँग्रेस का भी।

सत्य खोजने में किसी को यक़ीन नहीं। बनारस में तीन लाख फर्जी वोटर की ख़बर पर सिर्फ और सिर्फ फेसबुक पर ही बवाल हुआ। एक पेपर ने केजरीवाल के पोस्ट को आधार बनाकर बिना जाने कुछ छाप दिया और वहाँ से फेसबुक पर माराकाटी चालू हो गई। मैंने खोजा तो मुझे सच्चाई पता चल गई। लेकिन मैंने सबको बताना ज़रूरी नहीं समझा क्योंकि कभी कभी सत्य पर तीन आर्टिकल होते हैं और झूठ पर तीन सौ। ऐसा ही मोदी ने काला धन को लेकर किया, काँग्रेस ने सेक्युलरिज्म पर किया।

लेकिन हम अक्षरों की तलवार लेकर बिना खोजने या जानने की ज़हमत उठाए पिल पड़ते हैं सिर्फ फ़ेस वैल्यू पर क्योंकि हमारे लिए सत्य वही है जो हमें लगता है कि सच ‘होगा’। सच को होना नहीं पड़ता।

और इस कारण से लोग मन में क्रोध लिए, बातें बंद कर लेते हैं। ठीक है। कौन सा हम बात नहीं करेंगे तो तुम्हारी सैलरी नहीं आएगी और कौन सा तुम बात नहीं करोगे तो हमारा चूल्हा नहीं जलेगा।

और दोस्ती राजनीति का सेक्युलरिज्म का कुर्ता तो है नहीं कि हरा नहीं है तो कम्यूनल है। मन खिन्न होता है तो मैं मोदी से बात करने नहीं जाता ना ही आम आदमी पार्टी की टोपी पहन कर सोचता हूँ। मैं उससे बात करता हूँ जो मेरी बात सुनता है भले ही वो कम्यूनिस्ट विचारधारा का हो और मैं उसकी हर बात पर सवाल उठाता होऊँ।

दोस्त को आवाज़ देने से मेरी हार नहीं हो जाती ना ही मेरे दोस्त ऐसे हैं कि कहेंगे, “और? बहुत मोदी मोदी कर रहे थे, बात करने तो इसी कम्यूनिस्ट के पास आए!”

ये कोई ज्ञान की बात नहीं है। अगर आपको इतनी समझ नहीं कि लेस्बियन होने से आपकी दोस्ती पर कोई असर नहीं आता तो चुल्लू भर पानी लीजिए और कूदने की कोशिश कीजिए उसमें। उसमें डूबेंगे तो नहीं पर क्या पता इसी चक्कर में बालकनी से गिरकर मर जाएँ! समाज को आप जैसों की कोई ज़रूरत नहीं।

विचारधारा कोई संक्रामक रोग नहीं है कि बात करने से पकड़ लेगा। विचारधारा विपरीत हो फिर भी आदमी के शरीर में किडनी दो ही रहेगी, लेफ्टिस्ट की दायीं किडनी भी होती है और राईटिस्ट की बायीं भी। दोस्ती विचारधारा से बहुत बड़ी चीज़ है।

दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए

क्या गाना है!

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