कितने उत्तराखंड?

उत्तराखंड त्रासदी पर एक्सपर्ट पैनल का कहना है कि जलविद्युत परियोजनाओं का बहुत बड़ा हाथ था। केंद्र सरकार ने भी सहमति जताई है।

मूर्ख लोग इस वाद-विवाद में उलझेंगे कि किसकी सरकार थी। शायद वो ये नहीं जानते की सरकार कोई भी हो नीतियाँ लगभग वही होती है। इस कंपनी की बजाय उस कंपनी को काँट्रेक्ट मिल जाता, चाहे ये सरकार देती या वो सरकार। सरकार सबसे ज्यादा दोषी है।

होता क्या है कि एक बिलियन डॉलर भारतीय या विदेशी कंपनी को पैसा कमाना है, पैसा किसी भी क़ीमत पर कमाना है। जगह देख ली और सरकार के पास गए। इससे कोई मतलब नहीं कि वहाँ कौन रहता है, क्या करता है, वहाँ हाइडल पावर स्टेशन लगा तो कहाँ जाएँगे। ये सब मूर्खता भरे प्रश्न हैं जिसे पूछना कोई पसंद नहीं करता।

फिर लोगों को हटा कर, एक नया गाँव बसाया जाता है जिसमें घरों की जगह टेंट होते हैं। स्कूल नहीं होता, अस्पताल नहीं होता, खाना बनाने की जगह नहीं, सही पानी नहीं। मतलब सबकुछ भगवान् भरोसे। और ये मेक-शिफ़्ट गाँव महीनों से लेकर साल (या सालों तक) ऐसे ही रहते हैं।

बच्चे पढ़ नहीं पाते, नौजवानों को रोज़गार नहीं, वयस्क-प्रौढ़ के लिए कोई काम नहीं। सरकार भोजन देती है कैंप में। ये एक नया तरीक़ा होता है पूरे गाँव की आबादी को पंगू, लाचार और नकारा बना देने का। शायद सरकार को इससे मतलब है कि ज़िंदा तो हैं। बिल्कुल हैं पर किस तरह।

अब ये नौजवान उस नक्सली की नहीं सुनेंगे, जो सरकार की इस साज़िश के बारे में उसे बताकर सरकारी कर्मचारियों से बदला लेने को उकसाता है, तो किसकी सुनेंगे? नक्सली जो करते हैं वो तो किसी भी रूप में सही नहीं है क्योंकि किसी की जान ले लेना सीधे तौर पर गलत बात है। क्या समाधान है मुझे मालूम नहीं।

फ़ायदा किसको हुआ? एक कंपनी के कुछ लोगों को! सरकारी तंत्र को जिसने अच्छे खासे पैसे लिए! एक्सपर्ट को विकास का गीत सुनाकर चुप कर दिया गया क्योंकि लाऊडस्पीकर सरकार के पास है।

झेलना किसको पड़ा? पूरे राज्य को जो आज भी उबर नहीं पाया है उस भीषण बाढ़ से। सरकार का क्या गया? एक कमेटी बना दी, उसने रिपोर्ट दे दिया, सरकार ने कह दिया की सही है। तो भाई पहले ही क्यों नहीं समझ गए थे।

या हो सकता है ये हमारी जनसंख्या नियंत्रण का नया तरीक़ा हो! मुझे नहीं पता।

#Uttarakhand

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