फेसबुकिया बुद्धिजीविता और धार्मिक आतंकवाद: फ़्रीडम ऑफ (सेलेक्टिव) एक्सप्रेशन

भारतीय मीडिया, सोशल मीडिया पंडितों और फेसबुकिया बुद्धिजीवियों को क़रीब तीन सालों से मैंने गंभीरता से अध्ययन किया है। ख़ास करके धर्म के नाम पर होते रहने वाले आतंकी, और बाकी गतिविधियों (धर्मांतरण समेत अन्य) मुद्दों पर।

पता नहीं क्या बात है, ये सिर्फ मैंने देखा है या मेरा कोई अवचेतन पूर्वाग्रह (सबकॉन्शस प्रेज्यूडिस) है कि इन तीनों तरह के लोगों के लिए हिंदुत्व झंडाधारी संस्थाएँ या व्यक्ति ‘हिंदू आतंकी’, ‘सेफ्रन टेरर फैलाने वाले’ या ‘हिंदू फैनेटिक हैं। लेकिन ये तीनों तरह के लोग इसी तरह की शब्दावली बाकियों के लिए प्रयोग करने से बहुत कतराते हैं। मानो आईसिस आदि नव-कुरान वाचक आतंकवादी लोग बम फोड़कर सूफ़ी गीत की धुन बना रहे हों।

आईसिस, इंडियन मुजाहिदीन या तालिबान के आतंकी हमलों की निंदा करने वाला मेरा कोई भी मित्र (फेसबुकिया मित्र) मुस्लिम नहीं है। और कई मित्र गोधरा में धर्मांधता देखते हैं लेकिन मुंबई बमकांड या दिल्ली आदि सीरियल ब्लास्ट में नहीं।

ऐसा नहीं है कि ये लोग इस तरह के हमलों पर ये कहते हों कि हाँ भाई ये बम ब्लास्ट बहुत अच्छा किया। नहीं। हाँ आरएसएस की गतिविधियों पर, गोधरा दंगों पर मैं इन्हें भी और बाकी तीनों तरह के लोगों को तमाम लिंक शेयर करते देखता हूँ।

लेकिन आईसिस, तालिबान, इंडियन मुजाहिदीन आदि इस्लामी कट्टरपंथी सोच (मैंने हमेशा आतंक से धर्म को ये कहकर अलग रखा है कि इसका कोई धर्म नहीं है, आतंकवादी, आतंकवादी है वो इस्लामी या हिंदू आतंकवादी नहीं है। लेकिन आज कर रहा हूँ कि कोई जवाब दे इस पर।) पर ये न्यूट्रल रहते हैं।

मैं तरस गया हूँ कि मेरा कोई मित्र जिसका नाम इस्लामी हो, नमाज पढ़े ना पढ़े, रोज़े रखे ना रखे, इस्लाम की पाँचों बात का मान रखे ना रखे, कभी एक बार इस मज़हबी सोच पर जो बलात्कार, ग़ुलामी और नरसंहार को जायज़ क़रार देता है, अपनी बात रखे या कोई लिंक शेयर करे।

चाहे मुझे कोई भी विशेषण दो कि मैं मुस्लिम विरोधी हूँ, हिंदू फैनेटिक हूँ पर मुझे एक विचार का इंतज़ार है। क्योंकि दुनिया को इस विचार का इंतज़ार है। दुनिया को हो ना हो, मेरे टाईमलाईन को तो है। हाँ, ये आप कह सकते हैं कि वो बाध्य नहीं हैं अपनी विचार रखने को पर फिर आपको इस पूरे विषय से अलग रहना चाहिए।

समझौता ब्लास्ट पर आपके विचार हैं लेकिन सरोजिनी नगर वाले पर नहीं, तब तो गड़बड़ है। ये विचारों का दिवालियापन भी है और दोगलापन भी। गोधरा में हिंदू कट्टरवाद दिखता है, बाबरी में हिंदू कट्टरवाद दिखता है लेकिन मुंबई हमलों में नहीं, दिल्ली सीरियल ब्लास्ट में नहीं! ये विचारधारा मेरी समझ के बाहर है।

विचार तो छोड़ो, आजतक मेरा एक भी ऐसा पोस्ट नहीं जिस पर मैंने आतंकवाद की निंदा की हो और उसपर मेरे ऐसे दोस्तों का कोई कमेंट आया हो। मैं जजमेंटल नहीं हूँ, होता तो सुब्रह्मण्यम स्वामी की तरह पेज बनाकर ज़हर बाँटता फिरता सारे ऐसे दोस्तों को ब्लॉक करके।

लेकिन लोकतंत्र है। जरा देखें फ़्रीडम ऑफ सेलेक्टिव एक्सप्रेशन को।

PS: हो सकता है मेरा ये दुर्भाग्य हो कि ऐसे लोग मेरे फ्रेंडलिस्ट में ही हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा है तो बताएँ, नहीं है तो उनके पोस्ट का लिंक दें, मैं एक ‘स्टडी’ कर रहा हूँ इस विषय पर।

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