मीडिया का भड़वापन

मीडिया ग़ज़ब का भड़वा होता है। मौका कोई भी हो, भुना ही लेते हैं क्योंकि इनका काम है। काम लाईव कवरेज और फिर उसके बाद की कवरेज तक ही सीमित नहीं होता।

हैशटैग की हेराफेरी से लेकर होमपेज़ पर दस में से नौ स्टोरी इसलिए चलाए क्योंकि वो अभी ‘हॉट’ सर्च टर्म है। आधे घंटे के ‘स्पेशल’ जिसमें शब्दों का जंजाल जैसे कि ‘मासूमियत का ताबूत’, ‘लाल रंग लिए काले जूते’, ‘नम आँखो से नन्हीं जान को किया रुखसत’…

मुझे समझ में नहीं आता है कि गिरने की सीमा क्या है। इन मौतों पर बात करना ज़रूरी है, उनकी मौत को भुनाना नहीं। किसी का बच्चा मर गया है। वो कोई हैशटैग या हॉट सर्च आईटम नहीं है। लाशों से आते हिट्स और क्लिक्स के लिए उनकी क़ब्रें बार बार ना खोदो।

उनके जनाज़े रुख़सत हो चुके हैं, आप भी दफ़्न करो उन्हें। ये जनाज़े फिर ना उठें उन पर बात करो, हमें ऑडिटोरियम और उठती लाशों को मत दिखाओ।

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