PK movie review: पी के का नंगापन हमारे कपड़े उतार देता है

बहुत रिव्यू पढ़ चुके होंगे आप लोग। पी के की बात कर रहा हूँ। पी के नंगा उतरता है धरती पर और कपड़े पहन कर लौटता है। इस नग्नता और पहनावे के बीच जो होता है वह सांकेतिक तो है ही पर एक झन्नाटेदार तमाचा भी है। लेकिन सिर्फ तमाचा ही नहीं है, इसके और कई आयाम हैं।

नग्नता पी के का मुख्य थीम है। पी के सिर्फ कपड़ो से नंगा नहीं है। उसकी नग्नता और नवजात बच्चे की नग्नता बिल्कुल बराबर है, बस आकार का अंतर है। बहुत ही सधे तरीके से, घिसे पिटे बुद्धिजीवियों वाले संवादों को निर्देशक ने सही समय पर पंच के रूप में इस्तेमाल किया है। हँसी आती है लेकिन पी के की तड़प देखी नहीं जाती।

सवाल सारे सही उठाए हैं। ये सवाल हमारी रोज की चर्चा में ज़रूर उठता है लेकिन कहीं पहुँचता नहीं। हल्का सा वॉलीवुड अंत में ज़रूर नजर आता है लेकिन हिरानी जी हर फ़िल्म में अंत में ऐसा करते हैं। इमोशन भी है, ड्रामा भी है, हँसी भी है और कभी कभी रोना भी आ जाता है।

आप अगर आहत होने जाएँगे तो बहुत बार होंगे। सिख इस बात को देखकर ग़ुस्सा करेगा कि उसे पैसे माँगता दिखाया गया, मुस्लिम बुरक़े का अपमान देखकर, ईसाई ईशू मसीह को वाईन पीता देखकर और हिंदू तो हर जगह ही।

ये चश्मा घर पर छोड़कर जाईएगा। अक्षय के फ़िल्म ओह माय गॉड की ही तरह है पर ट्रीटमेंट अलग है। ये बताता है कि नंगा होना ज़रूरी है। बिना कपड़े के जिंदगी के अलग मायने हैं। कपड़े सिर्फ जूट, सिल्क या जॉर्जेट के नहीं बल्कि विचारों, बोलियों, विश्वासों और मजबूरियों के भी होते हैं।

पी के की बेबसी हमें हमारे सारे कपड़े उतार कर जिंदगी देखने को कहती है क्योंकि कौआ अगर टाई पहन लेगा तो अजीब लगेगा! है कि नहीं!

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