संवेदना, ‘कूल’ संवेदना और असम हिंसा

असम हिंसा में चौरासी लोग मर चुके हैं, और ये ऑफिशियल गिनती है। कल कुछ घरों में आतंकियों ने आग भी लगा दिया। कोकड़ाझाड़ और शोनितपुर में भी क़त्लेआम हुआ।

मीडिया को एक दिन देर से ख़बर लगी च च च! बेचारे बहुत व्यस्त थे, वो चुनाव भी तो हुआ था। मीडिया की एक ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री बनाना भी तो है। फिर कहीं किसी राज्य में फ्रेक्चर्ड मेन्डेट आ गया हो तो गठबंधन की ज़िम्मेदारी भी तो मीडिया की ही है ना, तो वो किया।

फिर पता चला कि असम में पचास लोग मारे गए हैं। पहले तो असम, अरे नॉर्थईस्ट का राज्य है। वहाँ तो ये सब चलता ही रहता है। दस-पचास तो मर ही जाते हैं। पाकिस्तान का पेशावर अटैक थोड़े ही था कि भाई दिन भर संवेदनाएँ, स्पेशल और प्राईमटाईम में चर्चा हो।

फिर ये कि आदिवासी, ट्राईबल लोग मरे हैं। ओह हो! ये ट्राईबल लोग होते ही क्यों हैं। चलो कोई बात नहीं, दो लाईन की ख़बर चला दो। मीडिया की ज़िम्मेदारी यहीं तक थी सो उन्होंने कर दी पूरी। मुख्यमंत्री बनाना ज्यादा ज़रूरी है तो उसपर थोड़ा ज़ोर दिया जाए।

अरे हाँ, वो काला धब्बा वाला प्रोफ़ाईल पिक, काली कवर पिक और कैंडल जलाकर व्हाट्सएप्प फ़ॉरवर्ड करने वाला ‘सोशल कूल कोशेंट किट’ इस पर नहीं निकला। शायद पेशावर वाले पर कैंडल जलाते जलाते ‘कूल’ और ‘थिंकिंग’ इन्डिविजुअल बनने का तेल ख़त्म हो गया होगा।

अरे हाँ, मैंने भी तो… नहीं नहीं, मैंने तब भी गाली दी थी इस दोहरेपन और दोगलेपन को और आज भी दे रहा हूँ। मैंने ना तो उस दिन काला धब्बा प्रोफ़ाईल पिक बनाया था, ना आज बनाऊँगा। मैंने आजतक किसी के लिए कैंडल नहीं जलाया, ना कभी जलाऊँगा।

इस दोगले लिबरलिज्म और स्यूडो-बुद्धिजीविता से बाहर आईए। पहले को ये मानिए कि असम भी भारत का ही हिस्सा है और नागालैंड इंग्लैंड के बगल में नहीं है। वहाँ के लोग भी लोग ही हैं, भारतीय तो बाद में हैं। पहले मानिए कि वो भी इंसान ही हैं, सिर्फ वो नहीं जिनके बारे में चौबीस घंटे आपको दिखाया जाता है। या सिर्फ वो इंसान नहीं जिनके बारे में आपके सारे दोस्त फेसबुक और ट्विटर पर लिंक डाल रहे हों।

और एक बात ये भी कि अगर इनकी बात आप नहीं करेंगे जिनके पास इंटरनेट और टीवी है तो पाकिस्तान तो करने आएगा नहीं। टीवी के दिन अब लद गए हैं। इंटरनेट अगले साल-दो साल में पब्लिक ऑपिनियन में बहुत बड़ा भागीदार होगा। और चूँकि इसमें हमारा या आपका कोई स्वार्थ नहीं होता तो ज़्यादातर बातें सही तरीके से रखी जा सकती है।

ख़ैर इसपर बात किसी और दिन। फ़िलहाल असम को अपनाईए, नॉर्थईस्ट को अपनाईए। इंसान को अपनाईए। संवेदना फेसबुक पर क्या ‘कूल’ चल रहा है ये देखकर मत प्रकट कीजिए। मोमबत्तियों और काले फोटो की भी ज़रूरत है, लेकिन इसमें भेदभाव और सेल्फी मत लाईए। कोई मर गया है।

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