नॉलेज़ के डिजिटल होने के नुक़सान

रूपर्ट मर्डोक ने जब ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोप के तमाम बड़े अख़बार ख़रीदना शुरू किया था तब समझदार लोगों को बहुत डर लगा था। डर वाजिब भी था, और है। जरा सोचिए कि मीडिया, जो कि समाज को सोचने के लिए विषय और बातें देती है वो अचानक से अपनी विवधता खो दे।

सारे पेपर वही छापने लगें जो मर्डोक (या कहें कि एक आदमी, या चंद लोग) चाहते हों। ये बहुत ही ख़तरनाक स्थिति है। क्योंकि एक आदमी के एक गलत ख़बर छापने या सही ख़बर रोक लेने से पूरी दुनिया पर असर पड़ सकता है। अमेरिका ने सीएनएन के ज़रिए ईराक युद्ध के समय एक ही तेल के कुएँ में आग लगाकर या साबित किया कि ईराक वाले हर जगह आग लगा रहे हैं, पूरी रिफाईनरी जला रहे हैं, विश्व पर तेल संकट आ जाएगा। और किया क्या! तेल ढो ढो कर अमेरिका ले गए। वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन नहीं मिला और इस पर बहुत ज्यादा चर्चा भी नहीं हुई।

ये तो एक उदाहरण है। अगर आप के हाथ में ख़बर छापने या रोकने की शक्ति आ जाए तो आप पूरी सरकार बदल सकते हैं, गिरा सकते हैं और गृहयुद्ध करा सकते हैं।

आज की दुनिया में पैसे और खदानों से कहीं ज्यादा ताक़त ‘ज्ञान’ का है। लेकिन दुर्भाग्य से वो भी डिजिटल बनकर कुछ सरकारों, कंपनियों या लोगों के हाथ में सीमित होकर रह जाएगा। नॉलेज़ पूरी मानवता की धरोहर होती है। इस पर ताला लगने से अमेरिका में इबोला पीड़ित लोग बचते रहेंगे और अफ़्रीका में हजारों मरते रहेंगे।

दुनिया को विकिपीडिया या ओपन सोर्स प्रोजेक्ट्स की बहुत ज़रूरत है। इन्फ़ॉर्मेशन का फ़्लो हर तरफ से हर तरफ होना चाहिए ना कि एक तरफ से हर तरफ। इन्फ़ॉर्मेशन पानी की टंकी नहीं है कि जितना चाहा, जितने बजे चाहा उतना पानी छोड़ दिया। इन्फ़ॉर्मेशन ग्राउण्ड वॉटर की तरह होना चाहिए जिसमें हम बोर वेल के मोटर से जब चाहें, जितना चाहें अपने इस्तेमाल के लिए खींच सकें।

इसीलिए नेट-न्यूट्रालिटी की बात हो रही है, इसीलिए गोरिल्ला ओपन एक्सेस की बात हो रही है, इसीलिए मुक्त इंटरनेट और मुक्त मीडिया की बात हो रही है।

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