नीत्शे का सुपरमैन

जर्मन दार्शनिक नीत्शे ‘दस स्पेक ज़रथ्रुस्ट्रा’ में एक Superman, Overman या übermensch की परिकल्पना करता है। ये आपका कॉमिक्स वाला सुपरमेन नहीं है जो स्टील मोड़ता पाया जाता है।

उसकी कल्पना बहुत ही वास्तविक थी कि मानवता का एक ही काम है और वो है बेहतर मानव बनाते रहना। इसके अलावा ह्यूमैनिटी को और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

इसका उपाय नीत्शे ने जैसे बताया है वो मैं अंग्रेज़ी में रख रहा हूँ:

“With the help of favourable measures great individuals might be reared who would be both different from and higher than those who heretofore have owed their existence to mere chance. Here we may still be hopeful: in the rearing of exceptional men.”

यहाँ rearing का मतलब टेस्ट ट्यूब बेबी या प्रयोगशालाओं में जेनेटिकली ऑल्टर किए जा सकने वाले इन्सान से नहीं हैं। लोग अक्सर यही समझ लेते हैं। इसका मतलब है कि लोगों को एक बेहतर और अनुकूल परिस्थिति देकर उन्हें महान बनाया जा सकता है। महान माने सेलिब्रिटी नहीं, महान मतलब जो समाज को अपने साथ बेहतरी की ओर ले जाता हो।

लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज सही मायनों में ऐसी परिस्थिति दे रहा है खुद के बाशिंदों को जहाँ उसे पाल-पोस कर ‘उबरमेन्च’ या ‘सुपरमैन’ बना सके?

सुपरमैन की अवधारणा धारे धीरे बदल गई है और स्टील मोड़ने वाले सुपरमैन को बेहतर समझा जाने लगा है। क्या वजह है कि कहीं आतंकी सत्ता हथियाना चाहते हैं, कहीं कोई देश विस्तार पाना चाहता है, तो कहीं अमेरिका जैसा पॉम्पस बास्टर्ड (बड़बोला दोगला) राष्ट्र ‘मानवता की रक्षा’ के नाम पर मानवों की बलि चढ़ाता फिरता है?

नीत्शे ने तो कह दिया था कि भगवान मर चुका है जैसा कि हम जानते आए हैं। उसी तरह धीरे धीरे बेहतर मानवों का दौर भी ख़त्म हो जाएगा। मानव बेहतर होते रहेंगे, लेकिन बेहतरी की परिभाषा बदल दी जाएगी। वो समय बहुत ख़तरनाक होगा।

#Nietzsche #Zarathustra #ubermensch

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