अमेरिकन स्नाईपर: फ़िल्म समीक्षा

अभी अभी ‘अमेरिकन स्नाईपर’ देखी। अच्छी फिल्म है। मतलब पाईरेटेड में भी प्रिंट बढिया था। देखिए कुछ चीजों में हम नैतिकता, या मोरालिटी का लोड नहीं लेते। इन दोनों शब्दों के, चाहे अंग्रेज़ी हो या हिंदी, मेरे लिए कई समयों और जगहों पर मायने नहीं होते।

हीरो भी, ब्रैडली कूपर, जिसने क्रिस कायल नामक मशहूर स्नाईपर का किरदार निभाया, मोरालिटी का लोड नहीं लेता। उसका मंत्र है ‘गॉड, कंट्री, फ़ैमिली’ का। बाईबिल हमेशा साथ में रखता है, देश के लिए लड़ाईयों में जाता है और अंत में अपने कई दोस्तों को मारने वाले दुश्मन स्नाईपर को मार कर ज्ञान प्राप्त करता है और अपनी पत्नी और बच्चों के लिए वापस आ जाता है।

पूछने पर कि क्या उसे एक सौ पैंसठ लोगों को मारने का थोड़ा भी क्षोभ नहीं, हीरो कहता है कि उसे इस बात का दुःख है कि वो अपने कुछ सैनिक साथियों की रक्षा नहीं कर पाया।

क्लिन्ट ईस्टवुड का निर्देशन है। फिल्म तमाम मायनों में अच्छी है चाहे निर्देशन हो, सिनेमेटोग्राफ़ी हो, अदाकारी हो या युद्ध के सटीक दृश्य।

अब फिल्म उनकी है। लड़ाईयाँ वो लड़ते हैं तो सैनिकों का मोराल हाई रखने के लिए तर्क भी वैसे ही देंगे। ये तो कहेंगे नहीं कि स्नाईपर अपने अंतर्द्वंद्व से लड़ रहा है क्योंकि उसे लोगों को मारना पड़ता है।

कहते है व्यक्ति अपने विचारों की पैदाईश होता है, वो जैसा सोचता है वैसा बनता जाता है। सबसे पहले शॉट में उसने एक बच्चे को और उसकी माँ को मारा था जो उसके यूनिट के ऊपर ग्रेनेड फेंक रहे थे। मैं होता तो मैं भी शायद वही करता। इसके बाद हीरो सिर्फ वहीं, पहले क़त्ल के बाद, खुद से ये सवाल पूछता है कि क्या ये सही है। और जवाब रटा-रटाया कि अगर तुम नहीं मारते तो वो हमारे लोगों को मार देता।

अगर हम यहाँ इन्हें ईराक में नहीं मारेंगे तो वो सेन डिएगो और न्यूयॉर्क पहुँच जाएँगे का लॉजिक लेकर फिल्म चलती है और स्नाईपर की जिंदगी दर्शाती है।

फ़िल्म को फ़िल्म की तरह देखने पर ही ठीक रहता है, फ़र्ज़ी का ज्ञानी बनने से मज़ा किरकिरा हो जाता है। ईस्टवुड ने कोई डॉक्यूमेंट्री तो बनाई नहीं कि वो उसके धार्मिक, पारिवारिक और आत्मीय विश्वासों को दिखाए। इसीलिए हमारी तरह मत देखिएगा, बस देखिएगा।

#AmericanSniper

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