जेने की बालकनी में हमारे एंकर

दिल्ली की मीडिया ज्याँ जेने (Jean Genet) रचित नाटक ‘ले बालकन’ या ‘द बालकनी’ टाईप हो गई है। जेने के नाटक में एक वेश्यालय (बालकनी) सत्ता में हो रही गतिविधियों का एक केंद्र जैसा दिखता है और बाहरी शहर की दुनिया का माईक्रोकॉज़्म या सूक्ष्म रूप है।

मैं वेश्यालय के लिए रंडीखाना शब्द का इस्तेमाल करूँगा, क्योंकि वो ज्यादा गंदा और चुभनेवाला है।

इसमें लोग आते हैं और तरह तरह के कपड़े पहन कर खुद को वैसा ही महसूस कराते हैं। कोई बिशप बनकर किसी वेश्या का पाप माफ़ कर रहा होता है, कोई जज बनकर किसी वेश्या को चोरी की सजा सुनाता है तो कोई सेना का मुखिया बनकर वेश्या को घोड़ा बनाकर उसकी सवारी करता है। इसके बाद क्या होता है उससे मेरा लेना देना नहीं है, उसके लिए जाकर नाटक पढ़िए।

खैर, हमारे एंकर और पत्रकार लोग मीडिया नाम के रंडीखाना में तरह तरह के कपड़े पहनकर उछलते कूदते नज़र आते हैं। ख़बरें वो रंडियाँ हैं जिन्हें हमारे महान एंकर लोग कभी पापी बनाकर पाप माफ़ करते हैं, कभी भ्रष्ट बताकर सजा देते हैं, और कभी कभी तो घोड़ी बनाकर सवारी भी कर लेते हैं।

इनमें सब एंकर शामिल हैं। रवीश जी आजकल एनडीटीवी नामक रंडीखाने में किरण बेदी वाली ख़बर को घोड़ी बनाकर चढ़ रहे हैं। वो उस रंडीखाने का फ़ैशन है। इनके और बाकी सारे एंकरों के रंडीबाजी का अंदाज़ शांत है, जो इन्हें गंभीर होने का लुक और फ़ील देता है।

रवीश जी को बाहर में सभ्य माना जाता है लेकिन आप उनपर नजर रखें तो पाएँगे कि वो उन लोगों में हैं जो जाते हैं और मास्क पहनकर खबरों की घोड़ी पर चढ़ते हैं। इस मास्क का कमाल ये है कि आपको लगेगा कि ख़बर बिल्कुल सती सावित्री है जबकि वो साड़ी रवीश जी घर से लेकर आते हैं और नंगी ख़बर को ढकने के लिए पहना देते हैं। पर्सनल च्वाईस है।

अर्णब जी टाईम्स नाऊ नामक रंडीखाने में शशि थरूर के ख़बर की रंडी पर सजा सुनाते रोज पाए जाते हैं। इनके रंडीबाजी का ढंग चिल्लाने वाला है, एकदम किन्की। और ये एकसाथ तीन तीन खबरों के साथ ऑर्गी में यक़ीन रखते हैं। तीन से कम में इनका काम नहीं होता। बीच बीच में ‘ओह यस्स्स!’ भी कहते हैं जब कोई इनकी हाँ में हाँ मिलाता है। लगता है एक ख़बर टेबल के नीचे बिठा रखी हो।

राजदीप जी ने पुराना रंडीखाना छोड़ दिया है, आजकल नए जगह पर जाते हैं। हेडलाईन्स टुडे नाम के रंडीखाने में ये मोदी के फ़ैन रंडियों की ख़बर लेते हैं। इनका अंदाज़ एकदम पनिशिंग है और ये रंडीबाजी के वक़्त थोड़ा मज़े लेते हुए दिखते हैं। चेहरे पर एक मुस्कान होती है, आँखो में वासना के लाल डोरे और हाथ में चाबुक!

एक-दो रंडीखानों, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी आदि, ने खुल्लमखुल्ला कह रखा है कि यहाँ यही होता है। लेकिन इनकी रंडियाँ बोरिंग हैं। रोज़ वही कपड़ा, रोज़ वही पोजिशन। और इनके एंकर लोग भी नया कुछ ट्राई नहीं करना चाहते।

बाकी जगहों का भी यही हाल है। चेहरे और ख़बरें बदलते हैं। मीडिया ख़बरों की वेश्यावृत्ति से ज्यादा कुछ नहीं। ये ज़रूर है कि कुछ लोग इस रंडीबाजी में निपुण हैं, कुछ नौसिखुए। कुछ वहाँ जाते हैं और चुपके से निकलने की कोशिश करते हैं कि कोई देख ना लें।

वैसे बीच बीच में बेचारी ख़बरों को थोड़ा रेस्ट दिया जाता है और एंकर लोग भी बाहर की दुनिया में सभ्य दिखने के लिए खबरों को पत्नी या गर्लफ़्रेंड जैसे ट्रीट करते हैं। लेकिन ये बहुत कम ही होता है।

हमलोग खबरों को देखकर हस्तमैथुन या मुखमैथुन करते हैं। हस्तमैथुन और मुखमैथुन का अपना आनंद है, हम सब इसमें प्रवीण हो चुके हैं। समाज में जब हस्तमैथुन ज्यादा होने लगे तो उसका विकास रुक जाता है। इसीलिए रंडीबाजी के साथ साथ हस्तमैथुन भी बंद होना चाहिए।

PS: पहली बात इसमें ‘रंडी’ शब्द वेश्याओं के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ है, प्रतीकात्मक है। अतः अपने नारीवादी घोड़े बाँधकर रखें।

ये कोई पोर्न या ईरोटिका नहीं है, ऐसा लगा हो तो यहाँ कमेंट या लाईक ना करें।

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