द इकॉनॉमिस्ट का कल्चर ज्ञान: आर्टिकल के रूप में अजेंडाबाजी

बुद्धिजीवी भारतवासियों की पुरानी आदत है कि वेस्टर्न मीडिया जो भी लिखे, भारत के हालात पर भी, हम एकदम जीभ लगा के चाट लेते हैं और गुनगाण करते रहते हैं।

कुछ लोगों की आदत होती है वो आर्टिकल शेयर करने की ताकि लोगों को पता चले कि वो वॉशिंगटन टाईम्स और द इकॉनॉमिस्ट भी पढ़ते हैं। मैं नहीं पढ़ता क्योंकि आजतक जो भी पढ़ा है लगता है कि वेस्ट में अपने घर से ना निकलने वाला जर्नलिस्ट मुझे मेरे ही कल्चर के बारे में बता रहा है।

यही बेचारे मंगलयान पर गाय-भैंस वाला कार्टून बनाते हैं और अगले दिन उनका अपना रॉकेट टेकऑफ से पहले फट जाता है। वेस्टर्न मीडिया धीरे धीरे सिर्फ और सिर्फ एजेंडाबाजी करने लगी है। लोकसभा चुनाव के पहले एक सुर में कोर्स गा रहे थे कि कैसे भाजपा की जीत भारत के लिए ख़तरनाक है और तरह तरह के लॉजिक की मुसलमानों को समस्या हो जाएगी, दंगे हो जाएँगे…

हुआ कुछ नहीं। भाजपा बहुमत से जीत गई। लेकिन इनका राग नहीं बदला है। आज इकॉनॉमिस्ट में हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ करके एक कचड़ा छपा है। एक बार पढ़ा तो बहुत ग़ुस्सा आया कि इन सालों को नौकरी कौन देता है जो पेपर पर टट्टी कर देते हैं! डेस्क पर बैठ कर ये लिख देना कि भारत में कन्वर्जन मुस्लिम लोगों का तलवार की नोक पर हुआ और ईसाईयों का बहला फुसला कर, ऐसा यहाँ के लोग सोचते हैं। लेकिन बेचारा पत्रकार ये नहीं बता पाता है कि एन्टी-कन्वर्जन बिल लाने में उसे क्यों दिक्कत है। यहाँ पर उसकी पत्रकारिता और ज्ञान दोनो भितरामपुर चले जाते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लिखने के बजाय हिंदू प्राईममिनिस्टर लिखना किस तरह के जर्नलिस्टिक एथिक का परिचायक है? बार बार हिंदू हार्डलाईनर, हिंदू दिस, हिंदू दैट लिख लिखकर ऐसा स्लैन्ट दिया जाता है मानों हिंदू ना हुआ बाकी धर्म वालों को मार-काट देगा!

इनका हाल नीरो जैसा है। अमेरिका में आए दिन कोई स्कूल में शूटआऊट करता है, कोई थियेटर में तो कोई फ़िल्ममेकर एक घिनौने स्नाईपर को, जो सारे इराक़ी को कैंसर मानता है और उनकी जान लेकर ख़ुश होता है, अमेरिकन हीरो बनाता है। ये सब तो बस वो ख़बरें हैं जो दिखती हैं, सुनी जाती हैं।

उस ‘कल्चर’ का कोई माई-बाप नहीं जहाँ रंगभेद, व्हाईट-सुप्रीमोसिज्म, मुसलमानों से घृणा आदि रोज़मर्रा का वो हिस्सा है जिसे सब बाय-डिफ़ॉल्ट मानकर जीते हैं। लेकिन इकॉनॉमिस्ट के पत्रकार महोदय कैसे कहें कि रोम जल रहा है!

वेस्टर्न मीडिया को बाकी सारे देश सर झुकाए नजर आने चाहिए इनके महामहिम के सामने। लेकिन भारत ना तो वर्ल्ड बैंक की फुड पॉलिसी पर साईन करने को तैयार हुआ, ना ही पर्यावरण समझौते पर, न्यूक्लियर पॉलिसी रिज़ेक्ट करता रहा वेस्ट की, अमेरिका के फ़ाईटर नहीं ख़रीदे…

सामने से डिप्लोमेटिकली तो कहा नहीं जा सकता तो यहाँ के पिछवाड़ा चाटने वाले ज्ञानी जनों को प्रकाशपुंज समान आर्टिकल्स के ज़रिये एक पूरी विचारधारा बनाने का सतत प्रयास जारी है। और हमारे बुद्धिजीवी भाईलोग ‘यार, इकॉनॉमिस्ट वाले क्या लिखते हैं! वॉल स्ट्रीट का आर्टिकल पढ़ा हिंदूइज्म के ऊपर?’ कहते थकते नहीं।

हमें भारत के बारे में, यहाँ के इतिहास के बारे में मैक्समूलर और विलियम जोन्स के कॉन्सेप्टस नहीं पढ़ने जिनकी कम्यूनिस्टों ने चाट चाट कर देश को लगातार जोड़ने की जगह हिस्ट्री की किताबें लिखकर बस बाँटा ही है।

इसीलिए, हमें कमसकम हमारे कल्चर पर ज्ञान ना दो। चोरों और लुटेरों के आने से तुम्हारा देश बना है। बाद में मेहनत कर के सुधरे और फिर अपने विकसित होने के ग़ुरूर में खुद की मार रहे हो। तो अपने समाज पर ध्यान दे लो, यहाँ साठ साल की स्वतंत्रता में जितना हो पाया वो ठीक है। हमें अपने हिसाब से चलने दो, मत बताओ कि हमारे प्रधानमंत्री का धर्म क्या है। वो हमारा प्रधानमंत्री है, वो हिंदू नहीं है।

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