फिल्म रिव्यू: बेबी देखिए बत्रा जैसे हॉल में

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बेबी देखिए जाकर। वो वाला बेबी नहीं और ना ही जानू वाला बेबी। अक्षय वाला बेबी देखिए। कसी हुई फिल्म है, मिनट भर भी बोर नहीं होंगे।

सभ्य लोगों वाले हॉल में इसका आनंद नहीं आएगा वो भी गणतंत्र दिवस के आस पास होने पर। टुटपुँजिया हॉल या सिंगल स्क्रीन में देखिए। आपके स्टेटस को थोड़ा धक्का लगेगा पर सौ रूपया का टिकट पर पाँच सौ का मज़ा।

फिल्म का गुंडा जब अपने ‘जिहादियों’ की भीड़ को भाषण देकर उत्तेजित कर रहा था तो हम भी एक बार भीड़ के साथ ‘अल्लाहु अकबर’ बोल दिए। फिर साथ वाला लौंडा लोग बताया कि ‘मार खाओगे’ जनता से तो हम बोले कि अगला बार ‘जय श्री राम’ का नारा लग जाएगा। हमारा कौन सा भगवान है, हम तो सबको समान रूप से गरियाते हैं!

सीटी जितना मारना था वो ‘रॉय’ के ट्रेलर में जेक़लीन को देखकर मार लिए। जेक़लीन भी सुंदर है लेकिन श्रुति हसन वाली बात नहीं है। फिल्म में एक आईटम सॉङ्ग की कमी खली। श्रुति हसन का ही डाँस दिखा देते तो माहौल आनन्दमय हो जाता।

ख़ैर फ़िल्म पर आते हैं। कहानी जासूसी है इसीलिए बता नहीं सकते लेकिन इतना बता सकते हैं कि कहानी और डायरेक्शन दोनों अच्छे हैं। पूरी फ़िल्म फ़ास्ट पेस्ड है। वॉलीवुडिया धुकधुकी लगी रहती है हर वक़्त की अब क्या होगा, अब क्या होगा, लेकिन होते होते वो हो जाता है जो होना चाहिए।

मार-धाड़ की कोरियोग्राफ़ी बेहतरीन है। मारता है तो लगता है आदमी ही मार रहा सन्नी या रजनीकांत नहीं। एक महिला भी फिल्म में बतौर जासूस है जो ग़ज़ब मार मारी है सुशांत सिंह को।

कुल मिलाकर बात ये है कि देख आईए। ऐसे फिल्म को लैपटॉप पर मत देखिए। ये हॉल में भावुक जनता के बीच देखने वाली फ़िल्म है, वहीं देखिए।

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