चुनाव चर्चा: डीयू के चुनावों की याद में

चुनावों का समय बड़ा आनंददायक होता है। बस आपमें मज़े लेने का हुनर होना चाहिए। मज़ा हर कोई नहीं ले पाता क्योंकि ज्यादा चाँसेज़ हैं कि आप एक पार्टी के सपोर्टर हैं और दूसरी पार्टी वाले का ट्रॉल आपसे बर्दाश्त नहीं हो पाएगा।

गाँव का वोटर अभी भी चालाक है। “कि हो चाचा, केकरा भोट देभो?” (क्या चाचा, किसको वोट दीजिएगा?)

“देबै केकरो… देईये देबै…” (देंगे किसी को… दे ही देंगे)

वो आज भी अपना वोट गुप्त मान कर चलता है। टीवी पर डेढ़ हजार लोग से पूछ कर टुटपुँजिया सर्वे के द्वारा एक करोड़ वोटर के मतदान का पैटर्न पता कर लेने वाला मज़ाक रोज होता रहता है। अंत दिन जीत कोई और जाता है।

डीयू के चुनाव में काँग्रेस के लिए एक दो बार कैंपेनिंग किए थे। देखने के लिए कि होता क्या है स्टूडेंट इलेक्शन में। हलाँकि वोट आज तक भाजपा को ही दिया है! रागिनी नायक, अमृता धवन के समय में। दोनों जीतीं थी। कैसे जीतीं थी वो हमें पता है। शाम में ‘व्हाईट हॉल व्हिस्की’ आ जाती थी कहीं से और किसी हॉस्टल के किसी बाबा को दो बोतल दारू और दो किलो मुर्ग़ा भिजवा देते थे एक काले बैग में।

हर इलाक़ा मैनेज होता था। छोटी छोटी ‘जन सभाएँ’ होती थीं जिसमें सौ-पचास लौंडे आ जाते थे। क्यों आते थे? दारू पीने और हाथ मिलाने।

“ज़रा हाथ मिलाईए मैडम, छू देगा तो आपकी ईज्जत नहीं जाएगी। हाँ वोट ज़रूर जाएगा। हाथ मिलाईए जोश में।” कंडीडेट को ये ज्ञान हमलोग देते थे। इसी में दस साल से आईएएस बनने की तैयारी करने वाले लौंडे अपना ठरकपन मिटा लेते थे हाथ देर तक पकड़ कर और गधों की तरह दाँत निपोड़ कर, “हें हें हें… आप ही को देंगे… वोट… हें हें हें!”

ठरकपन का जीत से बहुत लेना देना होता था। याद है कि एक कंडीडेट ने, जो आज काँग्रेस प्रवक्ता भी हैं, पैसे ख़र्च करने से मना कर दिया था और कहा था, “मैं दो दिन घूमूँगी और प्रेज़िडेंट बन जाऊँगी।” हुआ भी वही। मुस्कुराईए, हाथ मिलाईए, हाथ पकड़ने दीजिए देर तक, उसकी छिछली हँसी बर्दाश्त कीजिए और गिड़गिड़ाईए, फिर जीत आपकी।

ये माईक्रोकॉज़्म था बड़ा चुनावों का। सारी बातें वही होती हैं। दारू, पैसा, हाथ मिलाना। जीत उसी की होती है जिसके लड़के बूथ मैनेज कर सकते हैं। चुनाव की पूर्व संध्या को जो जितनी दारू बहाता है उसे वोटर की ख़ुमारी के अनुपात में फ़ायदा मिलता है।

अस्सी प्रतिशत वोटर तो फ़िक्स होते हैं, बाकी बीस प्रतिशत ईमानदारी, कम भ्रष्ट, इस बार किसी और को के ताने बाने में लिपट कर पार्टी बदलते हैं। यही बीस प्रतिशत खेल बनाता और बिगाड़ता है। इन सोचने वाले वोटरों से हर पार्टी को नफ़रत होती है।

सोचना बहुत बुरा काम है। कम सोचिए, मस्त रहिए। बाकी वोट दे दीजिए और वोट तक मज़े लीजिए।

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3 thoughts on “चुनाव चर्चा: डीयू के चुनावों की याद में

  1. आपको पढ़ के सुकून मिलता है। रसानुसार मूड और यथासंभव तैश बना के पढ़ते हैं। मजा आ जाता है।

  2. हमने आज ही एक बसपा की मैडम से हाथ मिलाया। दरअसल पड़ोसी ने देर तक मिलाए रखा और हमारे घर की घंटी भी उन्होने समय बचाने के लिए पहले बजा दी थी, सो मैं गेट पर ही खड़ा था। तो मेरे पास आकर खुद ही हाथ बढ़ा दिया।
    फिर आप वाले आए तमिलनाडु के दो काले लौंडे। कहा हम तमिल से आए हैं सर को सपोर्ट करने। दूरी मेन्टेन कर के कह दिया हाँ उनको ही देंगे।
    जो आता है सबको बस एक ही जवाब। आप ही को देंगे।

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