25 अप्रैल 2015 का भूकंप

कल जो महसूस किया और देखा वैसा कभी नहीं हुआ। चौकी पर बैठकर बातें चल रही थीं। लगा कि कुछ हिल रहा है। फिर इग्नोर किया कि कई बार मुझे लगता है कि हिल रही है धरती पर वो वहम होता है। सुनिश्चित करने के लिए देखा कि कहीं मौसम चौकी को हिली तो नहीं रही। तब लगा कि भूकंप आया है। “भाग मौसम… गौतम धरती डोललौ रे… भाग बरगाही…” कहते हुए शोर किया ताकि भौजी, चाची और भतीजे-भतीजियाँ बाहर निकलें।

निकल कर बाहर आए तो माँ को खोजा वो दिखी नहीं। तब भौजी को खोजने गए तो वो किचन में धरती पकड़ के बैठी हुई थी। मैंने बाहर आने को कहा तो तैयार नहीं हुई। फिर डाँट कर बाहर निकाला उनको। वो बाहर आयी और सर में चक्कर के कारण जमीन पर बैठ गई। आँगन में खड़ी मोटरसाईकिल सेंटरस्टैंड पर जोर से हिल रही थी। पास लगे टाटा विक्टा का शॉकर बहुत जोर से गाड़ी हिलने का संकेत दे रहा था।

हमारी माताजी का कोई पता नहीं था। तब शोर सुनकर वो बाथरूम से बाहर निकली। मैंने कहा दौड़ कर आओ, और लाने गया। तब वो साड़ी ढूँढने लगी कि आधे कपड़ों में कैसे आए। जल्दी से साड़ी को जैसे तैसे लपेटा और फिर आई। ये सारा कांड दस सेकेंड में हो गया।

हमलोग सब बाहर खड़े होकर सोच रहे थे कि कब ख़त्म होगा। मुझे ये डर लग रहा था कि कहीं धरती फट ना जाए और साला हम, अपने परिवार सहित, भीतर ना चले जाएँ! धड़कन तेज हो गई और ऊपर-नीचे हिलती धरती से दिमाग चकरा रहा था। पूरा शरीर हल्का हल्का लगने लगा। 

फिर जब थमा तो साँस में साँस आई। अब मैं आफ्टरशॉक का इंतजार कर रहा था। सबको कह दिया कि दोबारा हिलेगी कोई ना जाए अंदर। लेकिन कुछ लोग समझते नहीं, गए अंदर। थोड़ी देर में दोबारा मोटरसाईकिल हिली तो दौड़े दौड़े बाहर आए सब। 

पता चला गाँव में एक ग़रीब का घर ढह गया। एक पेंटर दीवार पोत रहा था। वो वहीं से बगल की छप्पड़ पर कूद गया इस डर से कि कहीं दीवार ही ना उसके ऊपर गिर जाए। किसी का घर बन रहा था तो ऊपर रखी ईंटें धरधरा कर गिर गईं।

ज्यादा क्षति तो नहीं हुई पर ऐसा डर और विस्मय कभी नहीं हुआ। आदमी को अपनी औक़ात का पता ऐसे ही मौक़ों पर चलता है।

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