नसीर साहब, इस्लाम पर फ़िल्म इसलिए नहीं बन सकती…

नसीरूद्दीन शाह ने कहा है कि ‘इस्लाम पर फ़िल्म बनाने की हिम्मत नहीं वॉलीवुड के फ़िल्मकारों में।’

मैं उन्हीं से ये जानना चाहता हूँ कि जिस देश में वंदे मातरम् गाने पर बवाल है, धोबी को धोबी कहने पर बवाल है, और क्रिटिसिज्म के नाम पर कबीर का ‘ता चढ़ी मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय’ के अलावा कुछ भी कहने पर दंगे होते हैं, वहाँ कोई भी क्यों पैसे लगाकर मरना चाहेगा?

बात हिम्मत की नहीं है। बात है कि क्या हमारा समाज इसके लिए तैयार है? क्या हिन्दु अपने कर्मकांडों की या मुसलमान अपने रूढ़िवादिता पर बनी फ़िल्म देखने के लिए तैयार हैं? 

नहीं तो, क्या ये ताज्जुब की बात नहीं कि सबसे बेहतरीन अदाकार, सबसे ज्यादा कमाई करने वाले कलाकार सब (कम से कम नाम से) मुसलमान ही हैं लेकिन उनकी तानाशाही फ़िल्मों में कौन सी हिरोईन रहेगी वहीं तक चल पाती है। 

फ़िल्म के गीत रिलीज़ होते नहीं कि यही समाज जो ‘मादरचोद’, ‘बहन के लौड़े’, ‘माँ चोद देंगे’ आदि कहता थकता नहीं, अचानक संवेदनशील हो जाता है फ़िल्मों में ‘कमीना’ और ‘हरामी’ जैसी गालियाँ सुनकर! वो समाज क्या आगज़नी और दंगों पर नहीं उतर आएगा अगर उसे कह दीजीए कि नक़ाब पहनना ग़ैरज़रूरी है या धर्म के नाम पर साल भर लाऊडस्पीकर में सीता-राम चिल्लाना चूतियाप है!

नसीर साहब, ना तो आपकी इंडस्ट्री, ना ही आपके साथी कलाकार, और ना ही हमारा समाज इतना समझदार हुआ है (या शायद होना नहीं चाहता) कि आप इस्लाम के ऊपर एक फ़िल्म बना दें। क्योंकि आप या मेरे दोस्त मानें या ना मानें, इस्लाम पर बनी फ़िल्म में पवित्र क़ुरान की भाँति एक नुक़्ते भर की गुँजाईश नहीं होनी चाहिए। वो फ़िल्म उतनी ही पाक-साफ़ हो जितना इस्लाम अपने बारे में सोचता है।

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