धर्म के नाम पर 

सुबह सुबह जगो और लोगों का चूतियाप देखकर मन करता है सोते ही रह जाते। अभी एक चूतिया टाईप का पोस्ट दिखा ‘ओपन लेटर टू लॉर्ड शिव, डियर शिवा यॉर डिवोटीज़ कॉज़ ट्रैफ़िक जैम’।

ओपन लैटर के चूतियापों के दौर में एक लेटर ये भी सही। ये लेटर चूतियापा इसीलिए है क्योंकि इसमें, काँवरिया जाम लगाते हैं, इसपर कोई चर्चा नहीं थी। इसमें दो राय नहीं कि काँवरियों के कारण जाम लगता ही है और ये रात-बेरात कहीं भी सड़क पर तंबू लगा लेते हैं, गाना बजाते हैं या पैदल आधी सड़क छेंक कर चलते हैं जिससे लोगों को बहुत परेशानी होती है।

ओपन लेटर में इस पर दिक्कत थी की सनी लियोनी के गाने ‘पानी वाला डाँस’ को ‘भोले वाला डाँस’ में बदल कर लोग नाच रहे थे। इसमें क्या दिक्कत है हमें समझ में नहीं आया। भजन तो कुछ भी हो सकता है। चाहे वो किसी गाने की तर्ज़ पर हो। ये लेटर लिखने वाला रोज रात में सनी लियोनी का वीडियो देखकर हस्तमैथुन करके सोता ज़रूर हो पर उसके एक गीत की तर्ज़ पर गाये जाने वाले भजन पर उसे आपत्ति है।

और इसे शेयर करने वाले, कमेंट करने वालों में अधिकतर लोग वो थे जिनके नाम वैसे हैं जैसे मुसलमान भाई रखते हैं। वो मुसलमान हैं कि नहीं ये तो उनका दिल जाने। मतलब पाँच बार नमाज भी पढ़ते होंगे, रोज़े रखते होंगे, संगीत सुनकर खोते नहीं होंगे, पॉर्न आजतक देखा नहीं होगा… मतलब आजतक वैसा कुछ नहीं किया होगा जो उन्हें मुसलमानों के लिए बताए आचरण से अलग करता हो।

मैंने सोचा कि एक ज्वलंत मुद्दे पर मैं भी ओपन लेटर लिखूँ। इस मुद्दे पर कबीर दास भी एक ट्वीट लिख चुके हैं, “काँकड़-पाथर जोड़ के मस्जिद लिया बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।” गाँव में जब आप सबसे गाढ़ी नींद में सो रहे होते हैं तभी बगल के गाँव के मस्जिदों के मुल्ला बाँग देकर आपकी नींद खराब कर देंगे ये बताने के लिए कि इलाक़े के मुसलमान जाग जाएँ, सुबह हो चुकी है, नमाज अदा करें आकर। 

ये मानसिक यातना है। और ये बाकी सारे धर्म के लोगों का धैर्य है की शांतिपूर्ण वातावरण बना रहे इसलिए लोग ये बर्दाश्त करते हैं। क्योंकि सबको पता है कि क़ुरान में अजान लाऊडस्पीकर पर दी जाय, ऐसा नहीं लिखा है। ऐसा तो क़तई नहीं लिखा है कि आप चाहे इलाक़े के अकेले गाँव हो जहाँ मस्जिद है और बस पचास लोग मस्जिद में आते हैं फिर भी सबकी नींद हराम करते रहें! 

सेकुलरिज्म वो है कि आपको भी पता है कि ये आपके धर्म का चूतियाप है, आप फिर भी करते हैं और लोग करने देते हैं। क्यों करते हैं आप ये भूल गए हैं क्योंकि आपके बाप, आपके दादा ऐसा करते आए हैं और किसी ने रोका नहीं। किसी ने इसलिए नहीं रोका क्योंकि कोई आपका अपमान करना नहीं चाहता। लोग मान लेते हैं कि ये इनके धर्म में मान्य है इसीलिए कभी भी इस बात पर एक शब्द नहीं बोलते। लेकिन किसी के कुछ नहीं बोलने से वो बात सच नहीं हो जाती।

जब आपको काँवरियों के नाचने पर आपत्ति है तो आपको लाऊडस्पीकर के अजान पर भी आपत्ति होनी चाहिए। और आप पढ़े लिखे मुसलमान हैं तो आपको घर के पास की मस्जिद में जाकर ये मुद्दा उठाना चाहिए कि भैया दूसरों को परेशान मत करो क्योंकि वो आपके धर्म की इज्जत करते हैं, धैर्यवान हैं।

हर धर्म आज अपने चूतिए फ़ॉलोवर्स, मुल्ला, पादरियों, पुजारियों के चक्कर में आकर विकृत रूप ले चुका है। विचित्र बात है कि मेरा ईसाई मित्र मेरे धर में बने प्रसाद को ग्रहण नहीं करता लेकिन मिशनरी के लोग कई जगहों पर जीसस की आरती गाते हैं, मदर मैरी की पूजा करते हैं फूलों से और लोगों को ये बताने पर तुले हैं कि जीसस भी वैसा ही जैसे तुम्हारे देवता। 

ये कैसे धर्म हैं जिससे किसी को ट्रैफ़िक जाम में फँसना होता है, किसी को सुबह सुबह जगने की मानसिक यातना झेलनी पड़ती है तो किसी को उल्लू बनना पड़ता है। खैर उल्लू तो सब ही बनते हैं। 

मैं तो सनी लियोन को ही देवी मानता हूँ और उसके हर गाने को भजन। लेकिन मुझे जीसस देवता वालों से भी उतनी ही घृणा है जितना अपने बहरे खुदा को लाऊडस्पीकर से बुलाने वाले मुसलमानों से और प्रशासन को ठेंगा दिखाते, सड़क छेंक कर उपद्रव करते काँवरियों से।

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