FTII प्रोटेस्ट: मुझे तो पता ही नहीं था!

FTII के बारे में ज्यादा नहीं जानता। ये भी नहीं पता था कि वहाँ के विद्यार्थी अपने प्राचार्य/डायरेक्टर आदि को चुनते हैं। ये तो बिल्कुल नहीं पता था कि उनके द्वारा अपने डायरेक्टर को घेर लेना, तोड़-फोड़ करना सब क़ानूनी तौर पर जायज़ है।
ये नहीं पता था कि सत्रह साल से कॉन्वोकेशन नहीं हुआ और जब हुआ था तो दिलीप कुमार, जो निहायत ही घटिया एक्टर रहे होंगे, पर जूते फेंके गए थे।

मुझे ये भी नहीं पता कि यहाँ की डिप्लोमा की पढ़ाई कितने सालों में पूरी होती है और कोर्स पूरा होने के बावजूद आठ-दस साल तक ‘विद्यार्थी’ कैम्पस में रह सकते हैं। 

अगर ये तमाम बातें सही हैं तो फिर ये संस्थान ज़रूर ही इकलौता है। मैंने तो जहाँ-जहाँ पढ़ाई की, वहाँ का प्रिंसिपल कौन था मुझे ठीक से याद तक नहीं। और उसके होने या ना होने से मेरी पढ़ाई पर शायद कोई असर नहीं पड़ा।

प्रोटेस्ट करना हमारा मूल अधिकार है। लेकिन पहले अपनी जमीन तो तलाश लो कि आठ साल से एक प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पा रहे जो शायद साल-दो साल में पूरा हो जाना चाहिए था। 

पहले अपनी गुणवत्ता जाँच लो कि क्या तुम वहाँ पढ़ने लायक हो? क्या ये सच नहीं कि पहले भी दो-दो लोग, जो तुम्हारी ही ‘इंडस्ट्री’ के हिसाब से (जो अक्सर मीडियोक्रिटी ही बनाता है) महान थे, विद्यार्थियों पर टिप्णियाँ करके छोड़ गए कि यहाँ के बच्चे अयोग्य हैं?

अयोग्य क्यों कह रहा हूँ? सबको नहीं कह रहा। उन्हें कह रहा हूँ जो समय पर अपनी फ़िल्में नहीं बना रहे और टिके हुए हैं। इसे आम शब्दों में ‘मठाधीशी’ भी कहते हैं। अयोग्य उन्हें कह रहा हूँ जो किसी के कहने पर डंडा-पत्थर लेकर, तोड़-फोड़ मचाते हुए ‘अहिंसक’ आंदोलन कर रहे हैं।

प्रोटेस्ट करना आपका अधिकार है, करते रहिए। लेकिन देश की एक संस्था में, जो मेरे पैसों से भी बना है, वहाँ अपना प्रोपोगेंडा लेकर उत्पात मत मचाईए। पढ़ने गए हैं, पढ़ाई कीजिए, मठाधीशी नहीं।
#FTII

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