कन्या लौंडा विमर्श: कन्या बुलाए तो चले ही जाना चाहिए

सुबह सुबह एक विद्यार्थी का फोन आया। शिक्षक दिवस विश नहीं किया, सीधे पूछा, “सर, हम फेसबुक पर लिखे कि बुक फ़ेयर जाना है किसी को तो एक लड़की ने लिखा कि हाँ जाएँगे लेकिन कल चलो तब। लेकिन हमारा मन तो आज ही जाने का है। क्या करें।”

अब बताईए कि इसमें दुविधा कहाँ से आ गई। भगवान कृष्ण ने भी गीता में कहा है कि धर्म की रक्षा के लिए कुछ भी करना हो करो। यहाँ पर लौंडा धर्म ये कहता है कि कन्या जब बुलाए चले जाओ। क्योंकि टू बी फ़ेयर, कन्या हमारे जैसे लौंडों को कहीं बुलाती नहीं और बुलाती है तो नहीं कहना अधर्म है।

कन्या बुलाए तो जगह, समय और कपड़ों का ध्यान किए बग़ैर सर्वप्रथम ‘हाँ’ कह देना चाहिए। स्वयं वासुदेवनंदन कृष्ण गीता के तीसरे अध्याय के आठवें श्लोक में कहते हैं, “तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।” (किसी को गलत लग रहा होएँगे तो चेक कर लो।)

अब लौंडे का कर्म क्या है? लौंडे का कर्म है कि प्रेम नामक सत्य की तरफ़ हमेशा अग्रसर होते रहना। लौंडा अगर कन्या के बुलाने पर नहीं जाएगा तो उसको ‘शरीर-निर्वाह’, यानि जिस कर्म के लिए उसने मानव शरीर धारण किसा है, सिद्ध नहीं होगा।

अतः, लौंडे का जीवन इसी बात में सफल है कि वो कन्या के इशारों पर हाँ कहता रहे। और जब कन्या खुद, खुलकर, सारी बात कह रही हो कि कहाँ जाना है और तुम्हारे साथ ही जाना है तब तो निहायत ही मूर्खता होगी कि लौंडा क्षण भर को भी इस पर सोच विचार करे।

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