धर्म, आस्था और नफ़रत 

एक मित्र हैं, फेसबुक पर, उन्होंने एक स्टेटस भेजा और मेरी राय माँगी। इसमें आस्था और नफ़रत की बात की गई थी कि हर वो काम जो आस्था के नाम पर होता है वो आस्था नहीं नफ़रत कराती है। मेरा जवाब:

जैसा कि मार्क्स ने कहा था धर्म भीड़ के लिए अफ़ीम की तरह है। हाँ उनका धर्म का पर्सपेक्टिव ईसाईयत तक सीमित हो सकता है पर आज के परिपेक्ष्य में देखें तो कहना सही है।

संस्कृत में कहते हैं कि धार्यते इति धर्मः अर्थात् जो धारण किया जाय वही धर्म है। तात्पर्य यह कि धर्म जीने का सलीक़ा है। धर्म सही और गलत में फ़र्क़ करना सिखाता है।

गाय और क़ुरान धर्म नहीं हैं। धर्म क्रॉस पर लटका जीसस क्राईस्ट भी नहीं है। धर्म होली वॉटर या गंगा में नहाना नहीं है। ये सब हमारे बनाए, खैर धर्म भी हम ही ने बनाया है, प्रतीक हैं, सिंबल।

मेरा मानना है, “धर्म मूर्खों की शरणस्थली है।” इसका मतलब ये है कि धर्म का आसरा जो लेते हैं इन बातों को जस्टिफाई करने के लिए वो कायर और नफ़रत से सने हुए मूर्ख होते हैं।

शार्ली एब्दो का कार्टूनिस्ट एक सीमा तोड़ रहा था और वो भी एक परपस के साथ। लेकिन उसकी हत्या इसका समाधान नहीं है। आईसिस ख़िलाफ़त लाना चाहता है और हूरों का बात करता है लेकिन क्या मजाल है कि उनमें से कोई भी क़ुरान या हडीथ को पढ़कर समझा हो!

रामायण पढ लेना, गाँधी की बात कि गो हत्या पाप है जान लेना, नमाज़ी हो जाना आदि से कुछ ना तो होता है ना ही साबित होता है। धर्म, कोई भी हो, सहनशील बनने की सलाह देता है। 

इन पंडितों, मुल्लों और पादरियों ने धर्म को गलत तरह से पहुँचाया है। खेत में काम करने वाला किसान या दिन भर खाना बनाकर, कपड़े धोकर, गेंहूँ की छँटाई करती हुइ मेरी माँ के पास ना तो समय है ना समझ की वो गीता पढ सके। वो पंडितों और प्रवचनों पर ही निर्भर हो सकते हैं। 

क़ुरान की आयतों को मौलवी ही समझा सकता है। लेकिन जब ज्ञान के श्रोत में ही मिलावट हो तो फिर आगे तो गड़बड़ होगी ही। जब मदरसों और स्कूलों में ये सिखाया जाय कि बाकी लोग काफ़िर हैं, घृणा के पात्र हैं, भटके हुए हैं तब तो सरकारें ‘व्हाईट मेन्स बर्डन’ लेकर विश्व भ्रमण करेंगी ही।

आस्था एक सकारात्मक सहायता देती है। आस्था किसी को कैसे भटकाएगी? नफ़रत ‘हमीं चुनीं, दीगरे नेस्त’ वाली बात है। तुम्हारा इस्लाम दुनिया का सबसे बेहतर धर्म है तो रहे लेकिन हिंदू कैसे काफ़िर हो गए? तुम्हारा सनातन धर्म सबसे बेहतर हो लेकिन मुसलमान घृणा का पात्र कैसे हो गया?

अंततः, सत्ता (पावर) का लोभ और ये बहकावा कि किसी को धर्म के नाम पर मारना उचित है, इस कोढ़ को जन्म देती है। इससे पढ़े लिखे चकरा जाते हैं क्योंकि यहाँ पर तो क़ुरान आकाश से उतरी है और वेद ब्रह्मा ने लिखे हैं। और वो आपके सारे ज्ञान और वाद-विवाद का उद्गम है।

फिर क्यों ना अल्लाह के नाम पर, पेट पर बम बाँधे, मॉल में ब्लास्ट कर दें! फिर क्यों ना राम की मूर्ति ‘प्रकट’ करा कर वहाँ बवाल करें जहाँ हर दूसरा मंदिर राम लला के वहीं जन्में होने का दावा करता है!

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