मानवता, दंगे और ‘कम्यूनल दंगे’

नयनतारा सहगल जैसे लोगों के कारण ही मानवता बची हुई है वर्ना दंगे तो कई हुए हैं।

दंगे कई प्रकार के होते हैं। पहला प्रकार है काँग्रेस के शासन के दंगे। मसलन, छियासी के सिख हत्याकांड वाले, फिर बिहार के नवासी वाले भागलपुर के और भी कई।

काँग्रेस वाले दंगे जो होते हैं, उसमें मानवता नहीं मरती। वो कम्यूनल नहीं है। क्योंकि, पहली बात, मानवता को दंगे का पता चल जाता है और वो कुछ दिनों के लिए कहीं छुप जाती है और उसकी मौत नहीं होती और ना ही उसकी आँखो का पानी कोई देख पाता है। और दूसरी बात काँग्रेस जो है वो मानवता की मौसेरी बहन है जिसकी दंगों से कट्टी है।

चूँकि ‘आँखो का पानी’ एक साहित्यिक मुहावरा और मानवतावादी वाक्याँश है तो साहित्य से लेना देना भी है। वो दिखता नहीं काँग्रेस वाले दंगे में, क्योंकि मानवता तो ‘लीव ऑफ़ एबसेंस’ लेकर राहुल गाँधी टाईप एस्पेन में कॉन्फ़्रेंस अटेंड कर रही होती है। इसीलिए साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाया जाता।

या ये भी हो सकता है कि कुछ लोगों की मानवता जगने में उनतीस साल का वक़्त लग जाता है। इस हिसाब से तो सही है क्योंकि, एक और कहावत भी है: जब जागे तभी सवेरा। एक और है: सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाय तो उसे भूला नहीं कहते।

नयनतारा जी तो छियासी के सुबह निकलीं थीं और आज घर पहुँची हैं लेकिन अवार्ड नहीं है साथ में। सरकार का पता शायद भूल गई होंगी। सरकारों के पते भी कहाँ होते हैं। सारा टाईम बाहर ढूँढ रही होंगी, और सरकार तो घर के ही लोग थे। खैर, हम तो नारीवादी आदमी हैं, इसपर व्यंग्य कैसे करें। यही बात रही होगी।

दूसरे टाईप का दंगा तो आप लोग जानते ही हैं। ये दंगा कम्यूनल होता है। (ये क्या ‘कम्यूनल’ लिखते ही फोन्ट कलर स्वयं ही सैफ्रन हो गया!) इस दंगे में दिल्ली जिसकी लंबाई या चौड़ाई खींच-खाँच के पचास किलोमीटर नहीं है, वहाँ से पचास किलोमीटर दूर दादरी में हुए अख़लाक़ की हत्या का ज़िम्मेदार आखिर कौन है, ये पता करना मुश्किल नहीं होता।

अरे भाई जब उसमें दिल्ली शब्द है, द से दिल्ली, द से दादरी तब तो पक्का रिलेशन है। और दिल्ली में किसकी सरकार है? “केजरीवाल की!” अरे वैसे नहीं घुमा कर जवाब दो, किसकी सरकार है? “ओह सॉरी, आई एम सॉरी… मोदी की” तो कौन जिम्मेदार है? “मोदी ही होगा, जा को नाम में भी द है!” खीं खीं खीं…

तो भैया ऐसा है कि नयनतारा जी के साथ सॉलिडेरिटी दिखाते हुए बीजेपी के समय में हुए अमेरिका में अफ़्रीकी-अमेरिकी अश्वेत नागरिक की हत्या के विरोध में अपने भविष्य में मिलने वाले तमाम साहित्यिक, असाहित्यिक, चिरकुटिक, वैश्विक, भारतीय आदि सारे सम्मान लौटाता हूँ। मीडिया से आग्रह है कि मुझे भी कवरेज़ दे।

अल्लाहु अकबर, बोलो राधे राधे, गॉड इज़ ग्रेट, और जोरोएस्ट्रिनिज्म में जो भी कहते हैं… खीं खीं खीं…

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