गोमाँस ईटिंग फ़ेस्टीवल, बुद्धिजीविता, हिंदू-मुसलमान ब्ला, ब्ला, ब्ला

जब आदम ने सेव खा लिया था तभी से दिक्कत शुरू हो गई थी। ज्यादा ज्ञानी हो जाने से दिक्कत होना लाज़मी है। ज्ञान से आपको दिक्कत नहीं होती, दूसरों को हो जाती है। सेव खाया आदम ने और सजा मिली पूरी मानवता को कि जाओ और धरती पर टहलते रहो।

आजकल का सेव जो है वो गोमाँस है। अंग्रेज़ी में बीफ़ कहते हैं। एक ‘सेकुलर’ राज्य में रहने वाले मेजोरिटी की व्यथा ये होती है कि माईनोरिटी तुष्टीकरण (अपीज़मेंट) और स्वघोषित बुद्धिजीवी बनने के चक्कर में हम जानबूझकर किसी की भावनाओं को हानि पहुँचाना चाहते हैं।

गोमाँस बहुत लोग खाते हैं। वंदे मातरम् बहुत मुसलमान नहीं गाते हैं। ईसाई लोग जीसस को देवता बनाकर दिल्ली यूनिवर्सिटी के फ़र्स्ट ईयर के बच्चों को जीसस भजन पार्टी पर बुलाते हैं और कुकीज़ खिलाते हैं। सारी बातें ठीक हैं क्योंकि हमारे संविधान की प्रस्तावना में ‘सेकुलर’ शब्द है और धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के दिए मौलिक अधिकारों में से एक है।

शार्ली एब्दो (गलती से चार्ली हेब्दो भी कहते हैं लोग) याद है आपको? कार्टूनिस्टों नें मोहम्मद का कार्टून बनाया था और फिर गॉड द फ़ादर के पास पहुँचा दिए गए। तब आपमें से कई ने ‘जे सुई शार्ली’ का हैश टैग लगाया था।

गोमाँस खाने पर किसी को आपत्ति नहीं थी इस देश में। मेरी पूरी शिक्षा के पीछे गौ-पालन की अर्थव्यवस्था का हाथ है और गाय हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा है। उसका दूध हम पीते हैं। मेरे पिताजी ने एक बूढ़े बैल को पचास हजार में एक कसाई को बेचने से मना कर दिया क्योंकि उनके लिए उसका उसी खूँटे पर मरना बेहतर है ना कि किसी आड़ी से बेदर्दी से कट कर।

आप सोच रहे होंगे कि मेरे हर पैराग्राफ़ में अलग अलग बातें हैं। बिलकुल हैं, लेकिन जुड़ी हुई हैं। धार्मिक भावनाएँ सिर्फ मुसलमानों की नहीं होती। भावनाओं के आहत होने के लिए माईनोरिटी होना ज़रूरी नहीं। लेकिन बुद्धिजीविता का परिचय देने के लिए माईनोरिटी अपीज़मेंट के साथ मेजोरिटी बैशिंग ज़रूरी होता है।

हिंदू को सेकुलर होने के लिए हिंदुत्व की भर्त्सना करनी पड़ती है। ये बाद अलग है कि हिंदू क्या है, क्यों है ये समझने की ज़रूरत किसी ने नहीं समझी है।

जब सुबह के चार बजे बगल की मस्जिद का मुल्ला गला फाड़ कर ‘अल्लाहु अकबर’ की बाँग देता है तो मेरी नींद टूटती है और वो मुझे अच्छा नहीं लगता। लेकिन मैं उससे ये पूछने नहीं गया कि क़ुरान की किस आयत में लाउडस्पीकर पर अजान देने की बात कही गई है वो भी चार बजे सुबह में।

अब आपके दिमाग में एक शब्द आया होगा ‘इस्लामोफ़ोब’ का। जी नहीं, वो मैं नहीं हूँ और आपके जैसे जजमेंटल लोगों के लिए मैं ये तर्क देकर साबित करने की कोशिश भी नहीं करना चाहता।

मैं क्या करता हूँ अजान सुनकर? एडजस्ट। क्यों? क्योंकि हिंदू धर्म सर्वसमावेशी है और बर्दाश्त करना सिखाता है। दूसरे धर्म और मत को जगह देना ही हिंदुत्व है। लेकिन आप ये सोच कर बैठ जाएँ कि आप जानबूझ कर किसी को उकसाएँगे और वो बर्दाश्त करता रहेगा तो ये आपकी भूल है।

आप बीफ़ खा रहे हैं, खाईए। शरीर के जिस जिस छेद से खा सकते हैं, खाईए। हमें दिक्कत नहीं। हमें का तात्पर्य व्यक्तिगत तौर पर ही लें। लेकिन हर आदमी के पास फेसबुक और ब्लॉग लिखने लायक बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती।

अगर आपको वंदे-मातरम् गाने पर ऐतराज़ है, आप दूसरे धर्म को उकसाने के लिए बीफ़ खाएँगे, आप एक देश में रहकर वहाँ की पुलिस से प्रोटेक्शन चाहते हों, वहाँ की नीतियों का हिस्सा हैं लेकिन क़ानून आप शरिया का मानेंगे तो फिर ये वैचारिक दोगलापन ही है। और इससे साफ़ पता चलता है कि आप किसी दूसरे धर्म का कितना सम्मान करते हैं।

ये सब मुसलमानों के लिए, सब बुद्धिजीवियों के लिए नहीं है। उनके लिए जो ऐसा करते हैं। गाय माता है या नहीं ये मसला अलग है। गाय तुम्हारे लिए माता नहीं है तो हम क्यों अल्लाहु अकबर झेलें? क्योंकि ये साम्प्रदायिक सौहार्द्र है। ये समावेशन है, इन्क्लूज़न, टॉलरेंस है। जो अगर हम तुम्हारे लिए दिखाते हैं तो तुम भी दिखाओ। नहीं दिखा सकते तो न्यूट्रल रहो।

गाय का माँस खाने का तुम आयोजन करो और ये सोचो कि अस्सी करोड़ हिंदूओं में तुम्हारे मोहम्मद के कार्टून बनाने पर गोली-बम मारने वाले मुसलमान सरीखा कोई पागल नहीं होगा तो ये मूर्खता है।

मैं कोई अल्टीमेटम नहीं दे रहा। मैं ये कहना चाह रहा हूँ कि पागल और मूर्ख हर धर्म में है। भावनाएँ हर धर्म के लोगों की आहत होती है। मोहम्मद का कार्टून बनाने से मुसलमानों को क्यों दिक्कत है? क्योंकि वो आपके पैग़म्बर हैं? तो रहें पैग़म्बर। ठीक वैसे ही जैसे आप ये सोचते हैं कि गाय हिंदुओं की माता है? तो रहे माता, हमारी तो नहीं।

तो भैया, बुद्धिजीविता के रोग में सने भैया लोग, गोमाँस खाओ, ठूँस ठूँस कर खाओ लेकिन वैचारिक खोखलापन मत दिखाओ कि सड़क पर खा रहे हो। ये दिलासा मत दो खुद को कि ये सॉलिडेरिटी है। पंद्रह लोगों के लिए सॉलिडेरिटी के चक्कर में अस्सी लोग को तुम जानबूझ कर दुःखी कर रहे हो। फिर कोई तुम्हें घसीट कर मार-पीट देगा तो रोते फिरोगे कि ‘मार दिया रे! मार दिया रे!’, ‘इस देश में ह्यूमन लाईफ़ का मूल्य नहीं’ ब्ला, ब्ला, ब्ला…

गोमाँस तो सदियों से लोग खा ही रहे हैं। और हिंदुओं ने अजान की तरह इसे भी बर्दाश्त ही किया है, और करते रहेंगे। शार्ली एब्दो ने गणेश का भी कार्टून बनाया था लेकिन कोई भी ‘जय श्री राम’ का पताका लिए क्लासनिकोव चलाते हुए पेरिस नहीं पहुँचा आजतक।

इसका मतलब ये नहीं कि हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता। मतलब सिर्फ ये है कि हमारे बर्दाश्त करने की क्षमता है और माँ-बाप, स्कूल ने धर्म के अलावा भी बहुत कुछ सिखाया है। चाहे सिखाया हो या नहीं, हमने समाज में ये सीखा है कि दूसरे के भावनाओं की क़द्र करो। ये नहीं सिखाया कि जानबूझ कर किसी को भड़काओ और कहो कि हम तो सॉलिडेरिटी दिखा रहे हैं।

मेरे पास कुछ मुद्दे हैं जिसपर बुद्धिजीवी लोग सॉलिडेरिटी दिखा सकते हैं: अशिक्षा, जेंडर वाॅयलेंस, किसान आत्महत्या, वॉटर-सेनिटेशन इशू, ग़रीबी, भुखमरी आदि।

लेकिन नहीं, इतना समय कहाँ है आपके पास। और उसमें तो हिंदू-मुसलमान भी नहीं है। उसमें तो आम इंसान है जिसके लिए धर्म बहुत बाद की बात है, खाने तक को लाले हैं।

दैट्स नॉट सो सेक्सी, इट डज़न्ट अपील, यू नो… द-द-द द एक्स फ़ैक्टर इज़ मिसिंग… बीफ़ ईटिंग हैज़ ऑल ऑफ़ इट एण्ड इट्स इन वोग एट द मोमेंट। एण्ड वी लिव इन द मोमेंट, यू सी… इन द मोमेंट बेबे… इन इट… आँ, आँ, आँ।

ये गाना सुनिए: आईसक्रीम खाऊँगी, कश्मीर जाऊँगी… कोई रिलेशन नहीं है पोस्ट से। रिलेशन तो आपके बीफ़ खाने का भी सॉलिडेरिटी से नहीं! खीं खीं खीं!

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