झुँड, झंडे और कई बार मर चुकी मानवता

आदमी का आदमी होना, और आदमी बने रहना दोनों दो बातें हो गई हैं। होना तो हमारे जन्म पर निर्भर है, लेकिन आदमी बने रहना हमारी मानसिकता पर। कितना आसान होता है कि आलू टिक्की के ठेले पर किसी दूसरे को आपसे पहले टिक्की देने पर आप पिस्तौल निकालते हैं और ठाँय से मार देते हैं। अब मोमो की चटनी और गोलगप्पे की सूखी पूड़ियों के लिए ही हत्यायें होनी रह गई हैं।

या फिर गुड़गाँव में डीजे से गाना सुनने के लिए गाली गलौज होता है और फिर वो हो जाता है जिसकी एक सभ्य, या असभ्य, किसी भी समाज में गुँजाईश नहीं होनी चाहिए। रोहित को हॉकी स्टिक से पीट पीट कर मार दिया जाता है।

समाचार वाले तो उसे भी बेचने में लगे हैं। शाम में मछली बाज़ार में सड़ती मछली को बेचने की क़वायद की तरह मीडिया अपने टेढ़े तराज़ू पर हर खबर को किसी तरह ‘ठिकाने’ लगाने की फ़िराक़ में होता है। ये ठिकाना हमारे आपके दिमाग में है। और हमारे लिए ये एक समाचार से ज्यादा कुछ भी नहीं क्योंकि हम तो हमेशा समाचार देखते ही रहते हैं।

समाचार देखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन समाचार सिर्फ देखते रहने में है। आदमी ये सोचने लगता है कि वो उस समाचार का हिस्सा नहीं है इसीलिए उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन फ़र्क़ पड़ना चाहिए। रोहित आपका भाई हो सकता था, आपका बेटा हो सकता था, आपका पति हो सकता था… रोहित ज़िंदा आदमी हो सकता था अगर किसी ने, किसी एक ने, एक बार सोचा होता कि डीजे के प्लेलिस्ट के गीत से ज्यादा महत्व एक जिंदगी का होता है।

लेकिन ऐसा सोचने वालों का अभाव है समाज में। समाज आज इस बात पर ज्यादा चिंतित है कि हिंदू भीड़ अख़लाक़ को मार देती है या मुस्लिम युवा प्रशांत पुजारी को।

समाज का इस बात की उपेक्षा करना कि आदमी, आदमी को मार देता है, ये किसी भी मौत या नरसंहार से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है।

भीड़ के न्याय को न्याय मान लेना और मानव मात्र की जिंदगी का आलू टिक्की के ऊपर ख़ात्मा, हमें बताता है कि होमो सेपियन्श हो जाना कोई बड़ी बात नहीं। चन्द्रयान और मंगलयान बनाकर ताली पीट लेने से हम महान नहीं हो गए। या ये कह कर कि हमने दुनिया को बुद्ध और महावीर दिया है। ऐसा लगता है कि दे ही दिया है, रखा नहीं थोड़ा भी अपने पास।

बुद्ध, गाँधी या महावीर के देश में पैदा हो जाने से कुछ होता तो इस समाज का सच में भला हो जाता। दो दलित बच्चों की जला कर की गई हत्या और ‘कुत्ते पर पत्थर मारना’ का उपयोग एक ही लाईन में करके हम क्या साबित करना चाह रहे हैं, वो बात ‘मिसकोट’ या ‘मिस रिप्रेजेंट’ नहीं हो सकती।

आदमी की असहिष्णुता सिर्फ दंगे कराने से नहीं झलकती। वो इससे भी दिखती है कि प्राणीमात्र को वो किस नज़रिए से देखता है। दंगे में दस, पचास या हजार लोग मरते हैं। हर दिन लाखों लोग मरते हैं। और लोगों के मरने पर बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया बार बार हमें ये भी बताते हैं कि ‘मानवता हुई शर्मसार’ और ‘हो गई मानवता की मौत’।

दंगे में किसी का मरना दुःखद तो है, लेकिन सोचनीय बात यह है कि दंगे होते ही क्यों हैं? जिंदगी की क़ीमत जब सौ-दो सौ रूपये में बिकती गोली के बराबर हो जाए तब समाज को प्रश्न करना चाहिए कि वो किस राह पर जा रहा है।

मानव को मानव से परेशानी नहीं है, झुँड को झुँड से परेशानी है।

दाढ़ी वालो का झुँड अलग है, तिलक वालों का अलग, क्रॉस वालों का अलग। गोरों का झुँड अलग है, कालों का अलग। भारत वालों का झुँड अलग है, पाकिस्तान वालों का अलग। किसी का झंडा हरा है तो किसी का लाल।

सारी मौतें झुँडों और झंडों के लिए होती है। मानवता झुँड और झंडों की हर भीड़ के गुज़रने के बाद फुटपाथ पर पिसी हुई, दम तोड़ती मिलती है।

पैदा होने पर आदमी ना तो दाढ़ी वाला होता है, ना तिलक वाला। ना उसे काले से दिक्कत है, ना गोरे से। आदमियत बचपन तक ही रह गई है और यही चलता रहा तो फिर कविताओं में, कम्प्यूटरीकृत शिलालेखों में मानवता के मौत की कहानी गोद-गोद कर लिखी मिलेगी।

लेकिन अब मानवता को मरने की जगह, पैदा होने की ज़रूरत है।

This story was first published on NewsGram 

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