पेरिस हमले: बम, बुलेट्स, ब्लास्ट, बयान, बर्गर

एक और टेररिस्ट अटैक हो गया। कहाँ हो गया ये बताना ज़रूरी नहीं क्योंकि कहीं तो हो ही गया है। कई लोग मर गए। लोग तो मरते ही हैं। वही अंतिम सत्य है।

बर्गर में मस्टर्ड पेस्ट डालिए और आनंद लीजिए।

ये सब एकदम क्लीशेड हो गया है कि मानवता मर गई, फलाना ढिमका। नए मुहावरे तलाशिए। बुद्धिजीवी लोग सिर्फ मुहावरे ही बनाते हैं। और बर्गर खाते हैं। हमें मेओनीस अच्छा नहीं लगता।

अच्छा तो ये टेरर अटैक भी नहीं लगता। लेकिन हम तो कोई ‘वर्ल्ड लीडर’ हैं नहीं कि हमारे अच्छा नहीं लगने को तरज़ीह दी जाएगी। ओलाँडे जी ने कह दिया है कि पेरिस आतंकी हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे और फ्राँस सख़्ती से निपटेगा। बयान जारी कर दिया ओबामा और बाकी ‘वर्ल्ड लीडर्स’ ने।

नेता लोग बयान ही जारी कर सकते हैं। वैसे बयान भी जारी करना ज़रूरी ही है। लोगों को लगता है कि कुछ हो रिया है। नेता लोगों को हमारी परवाह है। नेता लोगों के लिए बयान जारी करना महत्वपूर्ण है। बयान नहीं आएगा तो लोगों को लगेगा ही नहीं की सरकार कितनी मज़बूत है। छप्पन इंच का सीना है कि नहीं, उससे मतलब नहीं है। मतलब इससे है कि माईक पर ये बात बोली गई हो।

इसीलिए देश के साथ साथ वर्ल्ड लीडर का भी होना ज़रूरी है। दुनिया को फ़र्ज़ी का विश्वास चाहिए कि ‘ये बर्दाश्त नहीं किया जाएगा’, ‘आतंकी छोड़े नहीं जाएँगे’। आदमी टेंशन मुक्त हो जाता है और बर्गर खाता है। फिर उसी रेस्तराँ में ऑटोमेटिक क्लासनिकोव लिए कोई पगलेट आता है और टोमेटो कैचप फैला कर चला जाता है।

बयान ज़ारी करना सलमान ख़ान की फ़िल्मों की तरह हो गया है। सबको पता है कि कैसी भी हो, पिछले रिकॉर्ड तोड़ देगी। वैसे ही सबको पता है कि बयान आएगा। प्रेस वालों को पता होता है कि कौन कौन नेता कब बयान देगा। माईक-कैमरा लेकर पहुँच जाते हैं।

जितनी आम बात बयानबाज़ी है, उससे भी आम है आतंकी हमला। हमारे पश्चिमी देशों के नेतागण ये नहीं समझते कि दुनिया में अपने स्वार्थ के लिए सीरिया के एक ग्रुप को हथियार देना, गुड रेबेल और बैड रेबेल के नाम पर, काफी ख़तरनाक है। वो हथियार आईसिस के महान इस्लाम-रक्षकों के हाथ भी लग सकता है, इस पर ज्यादा दिमाग नहीं लगाते।

संसार में ‘डी-स्टेबिलिटी’ नहीं रहेगी तो इनके हथियार बिकेंगे नहीं। भारत पाकिस्तान लड़ता रहे, चीन के युद्धपोत समंदर में घुमते रहें। कुछ न कुछ होते रहना चाहिए। आखिर शांति के नाम पर नोबेल प्राईज़ मिलने वाले लोगों (ओबामा) और संगठनों (यूरोपियन यूनियन) को शांति लाने के लिए अशांति का वातावरण भी तो चाहिए! और डायनामाईट का आविष्कार ही श्री अल्फ्रेड नोबेल साहब ने किया है। उनके नाम की थोड़ी इज्जत तो करनी ही चाहिए।

देख भाई, इनको बेचना तो है ही कुछ ना कुछ। आमतौर पर नए मार्केट में बर्गर बेचेंगे, लेकिन जहाँ बर्गर नहीं बिक रहा वहाँ हथियार बेचेंगे। कहीं के लोग फिर बर्गर खाएँगे, कहीं के बम। जितना ज़रूरी बेचना है, उतनी ही ज़रूरी ख़पत भी।

अमेरिका तो नाईन-एलेवन के गीत रिपीट मोड पर लगाकर सुनता रहता है लेकिन हथियार बनाना नहीं बंद करता। ईराक में ‘वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ खोजने जाएगा, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान मारने जाएगा लेकिन चूँकि सीरिया के असद भाईजान से नहीं बन रही तो वहाँ इनके विमान वहीं जाएँगे। और तो और, रूस वहाँ के आतंकियों को मारेगा तो इन्हें दिक्कत हो जाएगी और बयान देंगे कि आम आदमी को मार रहा है।

मानवता के रक्षा का झंडा अमेरिका वहीं के लिए उठाता है जहाँ तेल हो। तेल तो सीरिया में भी है लेकिन वहाँ की सत्ता इनको मुताबिक़ नहीं है। इसीलिए पहले आईसिस का कैंसर फैलने दे रहे हैं कि सरकार गिरे तो एक कठपुतली बिठा देंगे। फिर वहाँ के सैनिकों की ट्रेनिंग, नए हथियार… बर्गर, पिज़्ज़ा… वग़ैरह वग़ैरह…

पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क, दिल्ली आदि पर हमले में मानवता मरती है लेकिन नाईजीरिया में बोको हराम जो कर रहा है उसमें मानवता वाला एंगल नहीं है। ये एंगल इसलिए नहीं है क्योंकि पहली बात वो गोरे नहीं है। गोरा होना मानव होने की पहली निशानी है। तो पहले अफ़्रीका वाले मानव बन जाएँ, फिर मानवता का झंडा भी उठाएगा अमेरिका।

सबसे पहले तो वहाँ फ़ेयर एण्ड लवली वालों को भेजा जाए और उनके विज्ञापन में ‘निखार’ या ‘गोरापन’ की जगह ‘मानवता’ का इस्तेमाल हो। जैसे कि ‘चौदह दिनों में पाएँ मानवता’, ‘पाँच मिनट में लाए मानवता की चमक’ आदि।

मुझे याद है कि शार्ली एब्दो वाले पेरिस आतंकी हमले में जब बारह लोग मरे थे तो उसे ‘नरसंहार’ कह कर मीडिया ने कवर किया था। उसी समय बोको हराम ने दो हज़ार लोगों को मार दिया था तो उसे ‘दो हजार लोगों की मौत’ कह दिया गया था।

लोग मरते रहते हैं। लोगों को मरते रहना चाहिए। बयान आते रहने चाहिए। बर्गर की बिक्री भी होनी ज़रूरी है। थोड़ा मस्टर्ड पेस्ट और डालिए, और खाईए।

This post was first published on NewsGram
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