फ्री बेसिक: डाईंग इन कोल्ड विद थ्री अदर्स

फ्री होता है धनिया और मिर्च जो दिल्ली में सब्ज़ी वाला आप माँगे ना माँगे दे ही देता है। और बेसिक होता है रोटी, कपड़ा और मकान। फ्री बेसिक के चूतियाप पर अमरीश पूरी का ‘दिलजले’ फिल्म का एक डायलॉग याद आ गया।

इसमें अमरीश पूरी साहब घड़ा बजाते रहते हैं और कहते हैं अजय देवगन से जो कि आतंकवादी है, “एक प्रेम कहानी में इक लड़की होती है, इक लड़का होता है… कभी सुना है आतंकवादी होता है?”

उसी तरह बेसिक का मतलब समझिए। बेसिक वो है जिसके बिना रहा नहीं जा सकता है। बेसिक रोटी, कपड़ा, मकान और बिजली है। जब ये सब मिल जाए तो, बेसिक न्यूट्रीशन, शिक्षा, हेल्थ है। ये भी हो जाए तो सड़क, रोज़गार आदि है। इंटरनेट इसमें कहीं भी नहीं है।

इंटरनेट के महत्व को झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन जिस देश में लोग फ्लाईओवर के नीचे ठंढ से मर रहे हों; जहाँ स्लम्स में नाली का पानी पीने को आपके देश की एक बहुत बड़ी जनसंख्या मजबूर हो; जहाँ लोग क़र्ज़ के मारे आत्महत्या कर रहे हों; जहाँ अशिक्षा और कुपोषण से हजारों बच्चे रोज़ मर रहे हों वहाँ आप इंटरनेट को ‘बेसिक’ के नाम पर बेच रहे हैं!

बड़े ही बेगैरत और इन्सेन्सिटिव आदमी हो यार! अभी द हिंदू का आर्टिकल पढ रहा था तो पता चला कि भारत से फेसबुक को एक अरब डॉलर का लाभ होता है और वो एक पैसा टैक्स में नहीं देता। कोई आश्चर्य नहीं की चीन, रूस आदि देशों ने अपना ही सोशल नेटवर्किंग साईट बनाई हुई है।

जुकरबर्ग तो सिलिकन वैली में रहता है। सिलिकन और वैली दोनो ही कितने सेक्सी साऊंड करते हैं। अब आईए भारत में जहाँ अस्सी प्रतिशत जनता पचास रूपये से कम में पूरा दिन गुज़ारती है। ये सेक्सी नहीं लगता। इसके डिटेल में जाऊँगा कि कितने लोग पढ रहे हैं, कितने के पास स्वास्थ्य सुविधा मुहैया है, कितने के पास साफ़ पानी है पीने को और कितने के पास पूरे घर को चला पाने लायक ‘बेसिक’ इनकम है तो आप डिस्गस्टेड फील करने लगेंगे। देयर इज़ नथिंग सेक्सी अबाऊट इट।

इंटरनेट का काम है सूचना पहुँचाना कहीं से भी कहीं तक। इसमें आप अपनी बात कहीं भी, किसी को भी कह सकते हैं। नेट पर आप स्वतंत्र हैं। फ्री बेसिक का मतलब है आप अपने आप के ऊपर एक ऐसा आदमी बिठा रहे हैं जो ये डिसाईड करेगा कि आप क्या लिखें, बोलें, पढ़ें और कहाँ से। फेसबुक या गूगल जैसी संस्था को आपसे कोई मतलब नहीं। वो आपका नाम, नंबर, ईमेल, और आप नेट पर कब क्या करते हैं, क्या पढ़ते हैं, क्या पसंद है, क्या नापसंद है सब एडवर्टाईजर्स को बेच देता है।

कभी सोचा है कि एक बैंक की साईट विज़िट करते ही आपको दूसरे बैंक की मेल बिना पूछे कैसे आ जाती है? कभी सोचा है कि आप यूट्यूब पर क्यूट पपी वाला वीडियो देखते हैं और उसी वक़्त पेडिग्री का विज्ञापन कैसे आ जाता है? कभी सोचा है कि फेसबुक पर मिंत्रा का एक प्रोडक्ट लाईक करने पर वो आपके पीछे क्यों पड़ जाता है?

हमें, आपको और आम जनता को पता भी नहीं चलता है कि हम जो भी इंटरनेट पर करते हैं वो कोई ना कोई अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

imageफ्री बेसिक कहता है कि ‘हम आपको इंटरनेट से जोड़ देंगे ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य सब कुछ आपको इंटरनेट से मिल जाए’। बताईए कितना भद्दा मजाक है ये। इंटरनेट से शिक्षा मिलेगी? इंटरनेट से डॉक्टर मिल जाएगा? साला प्राईरी हेल्थ क्लिनिक हैं नहीं, स्कूलों में छत नहीं है और खाने को पेट में अन्न नहीं और बाँट रहे हैं फ्री बेसिक।

और फ्री बेसिक किस भाषा में? अंग्रेजी में जो कि भारत में दस प्रतिशत जनता भी बमुश्किल पढ और समझ नहीं पाती। क्या आपके पास सारी मेडिकल, एजुकेशनल इन्फ़ॉर्मेशन तमिल, तेलुगु, हिंदी, बंगाली, असमिया, गुजराती, कश्मीरी आदि में है? मुझे तो पता है कि नहीं है। इन सब भाषाओं में पर्सनल ब्लॉग, एरिया रिलेटेड इन्फार्मेशन और कुछ न्यूज़ साईटों के अलावा कुछ भी नहीं।

उसको तो बेचना है। जहाँ आदमी ठंढ से मर रहा हो वहाँ उसे फेसबुक फ्री में भी दे दो तो वो मोबाईल ओढ़ कर नहीं सोएगा, ज्यादा से ज्यादा ये अपडेट करेगा कि ‘डाईंग इन कोल्ड विद थ्री अदर्स’।

विवेक का इस्तेमाल कीजिए। फ्री में तो साला धनिया मिर्च भी नहीं, सोलह रूपये पाव की सब्ज़ी बेचेगा तो धनिया मिर्च का भी पैसा वो लेता ही है।

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