Wazir movie review: वज़ीर देखिए कहानी और अदाकारी के लिए

imageवज़ीर देख आए कल। कहानी, फ़िल्मांकन और अदाकारी अच्छी है। पूरी फ़िल्म आपको इंगेज करती है। दो घंटे की है और आपको बोर नहीं होने देती।

शतरंज की बाज़ी और निजी ज़िंदगी की बाज़ी में अच्छा सामंजस्य दिखाया गया है। दो कहानियाँ, एक दूसरे से गुथी हुईं चल रही थीं और अंत में वही होता है जो आपको लगता है कि होगा।

जो शतरंज का खेल जानते हैं उन्हें एक परसेंट ज्यादा मज़ा आएगा। लेकिन, एक ही परसेंट।

ब्रिलिएंट या एक्सेलेन्ट नहीं लगी फ़िल्म। फ़िल्म अच्छी है। लोग जज़्बाती होकर लिख जाते हैं ये सब शब्द। लेकिन ज़्यादातर समय बुरी कहानियों और ‘डैडी-मम्मी हैं नहीं घर पे’ टाईप के ‘क्रिएटिव’ और बिकाऊ कंटेंट के कारण, थोड़ी अच्छी फ़िल्म भी बहुत अच्छी लग जाती है।

वज़ीर बहुत अच्छी नहीं है। वज़ीर अपने एक्सपेक्टेशन पर खड़ी उतरी है। अमिताभ हैं, फ़रहान हैं, दोनों बेहतर कलाकार हैं और निर्देशन में ये दिखता है।

मुझे एक बात जो कन्विंसिंग नहीं लगी वो ये है कि इतनी जल्दी दो मुलाक़ातों में ही फ़रहान अमिताभ के इतने क़रीब कैसे आ जाते हैं? और ये भी कि उनके जैसी सूझबूझ वाले अफ़सर को, जो कि एक मंत्री के हाथ मिलाने के तरीके से उसे ये कह देते हैं कि एक शॉल के बुनकर के लिए उनके हाथ मिलाने का तरीक़ा काफी सख़्त है, वो ये नहीं समझ पाता है कि अमिताभ उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करना चाह रहा है।

ख़ैर, फ़िल्म फिर भी अच्छी है और कसी हुई है। देखने जाईए। इसकी ताक़त इसकी कहानी और तीनों मुख्य पात्र -अदिति राव, अमिताभ, फ़रहान- की अदाकारी है। अदिति ने तो अपने किरदार को बहुत अच्छी तरह से निभाया है। ये फ़िल्म आप इन तीनों के लिए, और बिजॉय नाम्बियार के लिए, देख आईए।

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