रोहित मर गया, और मरता रहेगा विश्वविद्यालयों के दंड-विधान के कारण

रोहित वेमुला, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी फेलो, ने आत्महत्या कर ली। चैनल और एंकर इसे एक विद्यार्थी की आत्महत्या से कहीं ज्यादा एक ‘दलित’ विद्यार्थी की आत्महत्या कह रहे हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि इस बात पर बातचीत हो कि उसके दलित होने के कारण वो मरा इसके लिए उसका सिर्फ विद्यार्थी होना हमारे एंकरों के लिए कम पड़ रहा है।

जब तक उसके नाम के आगे ‘दलित’ विशेषण नहीं लगेगा, वो खबर शायद नहीं बिकेगी। एंकरों की बहस से ज्ञानवर्धन कम और बिक्री की बदबू ज्यादा आती है। रोहित की आत्महत्या तो आत्महत्या नहीं है, ये एक सुनियोजित हत्या है। उसका दलित होना और अंबेडकर विद्यार्थी संगठन का नेता होना भी उसकी इस हत्या का एक कारण है।

लेकिन रोहित ने लिखा है कि किस तरह से वो मानवता के विचारशून्य होने को लेकर दुःखी है। हम जब उसके बारे में बात करें तो ये ज्यादा बड़ा मुद्दा है कि हमारे विश्वविद्यालयों में हो क्या रहा है कि एक छात्र आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। वो दलित है, सवर्ण है, नार्थईस्टर्ण है या मुसलमान इससे बहुत ज्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता।

आत्महत्या के आँकड़े निकाले जाएँ तो पता चलेगा कि हर जाति, धर्म, वर्ग और मानसिक अवस्था को छात्र अलग अलग वजहों से आत्महत्या करते हैं। इसीलिए मैं रोहित को दलित कहकर नहीं बुलाऊँगा, क्योंकि वो एक छात्र था और किसी वजह से आंदोलन कर रहा थे। और आंदोलन करना, विरोध करना हमारा संविधान-सिद्ध अधिकार है।

विद्या के संस्थान आजकल गुंडई और नए नए तरह के फर्जी ‘वाद’ के अड्डे हो चले हैं। जिसकी सरकार है उसकी गुंडई चलती है। फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाकर किस संगठन ने क्या उखाड़ लिया पता नहीं। यूट्यूब के जमाने में ये सब निहायत ही मूर्खता है और ये बात दिखाने और विरोध करने वाले दोनों को पता होती है। फिर भी बवाल सिर्फ ईगो का है कि तुम दिखाना चाहते हो, हम नहीं दिखाने देंगे।

और आहत होना तो हमारे देश का राष्ट्रीय उद्योग है। ये सबसे ज्यादा रिटर्न देने वाला स्टार्टअप हो गया है। जिन्हें चार आने के सिक्के भर का धर्म का ज्ञान नहीं वो आहत होते फिर रहे हैं।

खैर, विश्वविद्यालयों में जो मठाधीशी चलती है वही रोहितों की जान लेती है। किसी ने प्रोटेस्ट किया, किसी ने मारपीट कर दी और आपने बिना जाँच किए पूरे सेमेस्टर के लिए निकाल दिया! फिर निकाले जाने के ऊपर प्रोटेस्ट किया तो जाँच कराने का वादा किया। लेकिन नए वी-सी आए तो उन्होने इसकी ज़रूरत नहीं समझी और एक कार्यकारी समिति (एक्ज़ीक्यूटिव काऊँसिल) ने उनकी सजा को और कड़ी करते हुए हॉस्टल से भी निकाल दिया।

अब मेरी समझ से बाहर ये बात है कि क्या विश्वविद्यालय प्रबंधन इतनी बचकानी है कि छात्रों से बदला लेती फिर रही है! प्रबंधन या मैनेजमेंट का काम मैनेज करना होता है, ना कि दंडित करना। अगर आपसे बाईस-पच्चीस साल के बच्चे नियंत्रित नहीं हो रहे तो आपकी प्रबंधन में दोष है।

कॉलेजों के छात्र नई सोच और नई आजादी, नए खुलेपन के साथ पहुँचते हैं। यहाँ उन्हें अपने शिक्षकों, सीनियर छात्रों के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। यहाँ वो अपने नागरिक होने का अहसास करते हैं। यहाँ वो स्कूली दंड-विधान और ‘डिसिप्लिन’ से बाहर स्वछंद होते हैं और ये महसूस करते हैं कि अपनी सोच का, समझ का उपयोग वो प्रश्न करके, प्रोटेस्ट करके कर सकते हैं।

अगर आपसे ये विद्यार्थी नहीं सम्हल रहे तो चुल्लू भर पानी में नाक डुबो के मर जाईए। अगर आपसे चार बच्चों की शैक्षणिक और सामाजिक परवरिश नही हो रही तो आत्महत्या आपको करनी चाहिए। आपके लिए एक छात्र की मौत महज़ एक आँकड़ा हो सकती है, इस समाज के लिए ये एक दुर्भाग्यपूर्ण बात है।

छात्रों का प्रदर्शन कितना हिंसक हो सकता है? अगर गोली-बम लेकर आ रहे हैं तो गेट पर रोकिए। बाकी हो-हल्ला और नारेबाज़ी आपसे बर्दाश्त नहीं होती तो जिंदगी भर स्कूलों में यूनिफ़ॉर्म पहना कर नचाते रहिए एक टाँग पर।

विश्वविद्यालयों में प्रोटेस्ट होना ज़रूरी है। जहाँ ऐसा नहीं हो रहा, वहाँ दिक्कत है। आगे बढ़ने के लिए सवाल उठने चाहिए। प्रजातंत्र में प्रश्नों का होना ज़रूरी है वर्ना हिटलर ने भी जर्मनी को विकसित बना दिया था। प्रश्नों का जवाब मिलना चाहिए, दंड नहीं। रोहित को जवाब नहीं दंड मिला और उसे ये समझ में नहीं आया कि ये दंड कौन दे रहा है, क्यों दे रहा है, इससे क्या हासिल होगा। उसे पता था कि उसकी मौत से भी कुछ नहीं होगा और शायद इसीलिए उसने किसी को दोष देने की भी ज़हमत नहीं उठाई।

रोहित को मार डाला है इस तंत्र ने। इस हत्या का जिम्मेदार हमारा तंत्र है जहाँ विद्यार्थियों को काऊंसलिंग और बातचीत से समझाने की बजाय उसे बाहर निकाल दिया जाता है और उसके पढ़ने, बढ़ने का सारा ज़रिया रोक दिया जाता है। जब तक विरोध को दबाया जाएगा, कभी भी वाद-विवाद एक साकारात्मक मोड़ तक नहीं पहुँच सकता। तब तक ये समाज उसी गर्त मे गिरा रहेगा जहाँ है।

फिर ना कहिएगा कि देश में फ़िल्मों का, विज्ञान का, कला का स्तर क्यों गिर रहा है। ये इसीलिए गिर रहा है कि एक बंदा जो अच्छा लेखक बन सकता था, वो सिर्फ अपनी आत्महत्या के पहले एक पत्र लिख पाता है। और वो ऐसा पत्र है जिसकी भाषा कहती है कि शायद वो बहुत बढिया लेखक बन जाता। ये इसीलिए गिर रहा है क्योंकि तुमने तलवे चाटने वालों को कुर्सियाँ दे दी हैं। ये इसीलिए गिर रहा है क्योंकि तुम्हारी बातों में, तुम्हारे लहज़े में इन प्रोटेस्ट करने वाले छात्रों के लिए कोई सम्मान नहीं है।

Advertisements

Did you like the post, how about giving your views...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s