भड़वा, दल्ला कहने वाले ‘मासूम छात्र’

हर वीडिओ जिसपर बवाल होता है, उसमें देखने लायक बात ये होती है कि सारा ज्ञान और तर्क जो उस दस सेकेंड के रिपीट मोड पर चल रहे वीडिओ में उतनी देर दिखता है उसी पर दिया जाता है।

लोग बहुत ही कन्विनिएंटली ये भूल जाते हैं कि हर दस सेकेंड के वीडिओ के पहले भी कुछ होता है। वो ये भी भूल जाते हैं कि रिपीट मोड पर तथाकथित विद्यार्थियों को पड़ता एक डंडा ऐसा लगता है मानो दस बार पड़ा हो। उस हड़बड़ी में लिए वीडिओ में लंबे बाल वाला लड़का भी लड़की हो जाता है।

लेकिन इतना समय किसके पास है! लोगों के पास फैसला सुनाने का बहुत समय होता है। ‘पुलिस ने स्टूडेंट को ब्रूटली मारा’ कहकर पूरा लॉजिक लगा देंगे। जरा ये भी तो पूछा जाय कि पुलिस ने क्यों मारा? और ये फुली डेवलप्ड एडल्ट स्टूडेंट को होली काव क्यों माना जाए? इन्हें ये नहीं पता कि प्रोटेस्ट करना उनका मूल अधिकार है लेकिन दूसरे (पुलिस को दल्ला, हिजड़ा और भी पता नहीं क्या क्या कहना) को मुँह पर गाली देना किसी दूसरे के अधिकारों का उल्लंघन है?

जिस देश की छात्र राजनीति इस स्तर की हो वहाँ मुझे लगता है पुलिस अपना काम बहुत ही सही तरीके से कर रही है। ये प्रोटेस्ट को दबाना नहीं है, ये ऐसे ‘युवा छात्रों’ को ये बताना है कि प्रोटेस्ट और अराजकता में अंतर है। प्रजातंत्र में प्रोटेस्ट की जगह है, प्रोटेस्ट करना ही प्रजातंत्र नहीं है। आपको अगर दल्ला कहने का अधिकार है, और आप एक महिला होकर किसी को भड़वा और दल्ला कहती हैं तो आपकी परवरिश में कमी रह गई। आपको लड़की कहलाने का भी हक नहीं। जरा सोचिए तो दल्ला और भड़वा कहने पर गाली किसी औरत पर ही तो ख़त्म होती है! पुलिस तो ‘स्थिति को नियंत्रित’ करने के लिए लाठी का प्रयोग कर सकती है, वो भी क़ानूनन।

क्या हमारे ‘युवा’ ‘छात्र’ नेताओं को इतनी तमीज़ नहीं की पुलिस जो स्थिति नियंत्रण में रखने आई है उसको जानबूझ कर ना उकसाएँ। प्रधानमंत्री को गाली दीजिए, वो आपकी गाली सुनेगा भी नहीं। सुन भी लेगा तो कुछ करेगा नहीं क्योंकि प्रजातंत्र है। लेकिन पुलिस को अपने छात्र होने का सर्टिफिकेट लिए क्यों गाली दे रहे हो? वो तो अपना काम कर रही है।

ध्यान रहे कि पुलिस रोबोट नहीं है। अभी तक ये नहीं पता कि पुलिस ने कितना मारा और क्यों मारा। लाठीचार्ज करना बिल्कुल क़ानूनी काम है अगर पुलिस के पास वैसा करने का कारण हो तो। जो प्रोटेस्ट, ख़ासकर के इस तरह के प्रोटेस्ट, करने जाते हैं उन्हें ये पता होना चाहिए कि किसी को ‘दल्ला’ कहना और बाद में ‘मासूम छात्र’ बन जाना दोनों एक साथ संभव नहीं।

ऐसे प्रोटेस्ट कीजिएगा तो संविधान का वो पन्ना भी पलट लीजिए जिसमें आपके अधिकारों पर ‘रीजनेबल रेस्ट्रिक्शन्स’ भी हैं उसी आर्टिकल १९ में।

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